वो याद बचपन
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किसी भी बात पर ठहाके लगाना छोड़ दिया।
वो छत पर जाकर बारिशों में नहाना छोड़ दिया।
छोड़ दिया भरी धूप में पेडों के नीचे मिट्टि से खेलना ।
छोड़ दिया अब यारो को पीछे से आकर धकेलना।
मगर नहीं छुटी वो याद बचपन की।
घरवालों से छुपकर जागी वो रात बचपन की।
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गगन टांकड़ा
(28।04।17)
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