जली हुई नज्म
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जली हुई नज्म की राख से एक मूर्ति तेरी जो बनानी चाही,,
लाख कोशिशें की पर नाकामी ही हाथ आई,,,
क्योंकि
क्योंकि ये राख नम तो होजाती है अश्को से मगर जज्बातो से जमती नही ।
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गगन टांकड़ा
(२८/०२/१८)
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