गुलिस्तां तकता रहा आस तुम्हारी
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गुलिस्तां तकता रहा आस तुम्हारी,,,
और एक तुम हो जो जंगलो में ही आसरे ढूंढते रहे।
वादियों ने भी देखी है बाट कई बार तुम्हारी,,,
और एक तुम थे जो बीहड़ो में सुकून ढूंढने निकले।
विशाल वृक्ष खड़ा था देने को तुम्हे सुकून भरी छांव।
और एक तुम थे,,,जो तपते रेगिस्तान में सहारे ढूंढने निकले।
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गगन टांकड़ा
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