आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें
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आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें
घर में ही रहकर कोई नयी खोज करें
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें
मिला है फिरसे आज वक़्त।
अपनों के संग जीने का।
इसका भरपूर आनंद लें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
घर के कोनों में आंगन में दरबे में।
जो की थी कभी हमने शैतानी।
चलो उनको फिरसे याद करें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
माना की अब दूरी बढ़ गई है।
तो क्यों न छत पर चढ़कर।
पतंगों के पेचों से गले मिलें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
टूट गया था जो लकड़ी का चेतक घोड़ा।
फुट गया था जो माटी का बोना।
चलो आज उनकी ही मरम्मत करें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
फटी चादरों से हो टेंट लगाना।
या दोपहरी में छिपकर गार्डन में मिटटी की गुड़िया बनाना।
अरे भाई कुछ तो उत्पात करें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
ढोलक चम्मच संग पैरों की थाप बिठाना।
या चुनरी ढककर धक्-धक् पर नाच जाना।
चलो कुछ नया कोरियोग्राफ करें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
चौरस ,कैरम या हो शतरंज।
ताश,तम्बोला या पकड़ाई-पकड़म।
कोई भी चाल चलें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।
घर में ही रहकर कोई नयी खोज करें।
आओ फिरसे बचपन को मुड़ चलें।।
आओ भारत को सुरक्षित करें।
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गगन टांकड़ा
(२२/०३/२०२०)
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