-: बावली अम्मा :-
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गाड़ी संख्या "६४५९३" आगरा केंट से चलकर निजामुद्दीन को जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म संख्या दो पर आ चुकी है।
मथुरा जंक्शन पर एक उद्घोष हुआ , ट्रेन रुकी और भीड़ का एक रेला अंदर की ओर लपका, जो अंदर से बाहर आना चाह रहे थे एक बार को तो वो भी वापिस घुस आए पर सब उतर और चढ़ गए।
ट्रेन चल पड़ी और मैं भी उसमे चढ़ लिया , मैं चने बेचने वाला हूँ , रोज इसी तरह चढ़ता और उतरता हूँ इन्ही ट्रेनों से।
ठेके पर तो नहीं हूँ मगर साहब को रोज के पचास रूपए देकर रोजी-रोटी चलाता हूँ।
कई लोग रोज आते जाते हैं उनमे से कुछ मेरे फिक्स ग्राहक हैं , जो थोड़े ज्यादा चने तो लेते हैं पर कमाई करा देते हैं।
"चने -चने " चिल्लाते हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे और दूसरे से और दूसरे डिब्बे में जाना पड़ता है।भीड़ बहुत होती है संतुलन बनाना आसान नहीं होता कभी कभी तो इतना बुरा हाल होता है कि खड़ा होना भी दूसरों के बक्से या बोरियो पर पड़ता है।
खैर मथुरा से फरीदाबाद ऐसे ही निकल जाता है फिर जाकर सांस आती है।
टिकट सस्ती होने की वजह से बड़े लोग भी इसी में सफर करते हैं , मगर वो कुछ धंधा नहीं कराते बल्कि पूछने पर कुछ ऐसा मुहं बनाते हैं मानलो कुछ नाजायज मांग लिया हो।
असली कमाई तो बच्चे कराते हैं जिद्द कर-कर के दो चार पत्ते तो बनवा ही लेते हैं, मगर पुलिस और बाबाजी भी बहुत हैं इसमें , कभी पल्ले पड़ जाएं तो माल का माल लेलें और पैसे के नाम पर ठेंगा दे दें।
पर मुझे तो चटोरी औरतों की तलाश रहती है ,जहाँ चार पांच एक साथ इकट्ठी हुई समझलो सौ (१००)का नोट सीधा।
पर एक समस्या और भी है कि में अकेला नहीं चढ़ता कई और भी होते हैं साथ में चिप्स वाला,खीरे वाला,चूरन वाला,और तो और चने वाले भी कई हैं फिर भी सही कमाई हो जाती है रोज के तीन सौ (३००)तो कमा ही लेता हूँ।
आज का दिन भी अच्छा ही था काफी भीड़ चढ़ी थी मैं भी चढ़ गया और आवाज लगाने लगा।
मैं दो डिब्बों में होकर तीसरे में घुसा कुछ लोगों ने चने बनवाए , तभी एक औरत ने मुझे इशारा किया वो बिलकुल पागल लग रही थी
काली-कुचली मानो कई दिनों से नहाई न हो,तन पर चीथड़े लिपटे थे ,बदहवास सी ऐसा लग रहा था मानो नशे में हो ,कभी हँसती ,कभी चीखती ,कभी लेट जाती , मैं दो बार उस डिब्बे से निकला मगर मेने उसे कुछ नहीं दया क्यूंकि वो एक भिकारी थी और मुझे कुछ नहीं देती।
कुछ भले लड़को ने उसे चने खरीदकर देदिये ,जब मैं आगे बढ़ा तो किसी ने चने बनवाए मैं रुककर चने बनाने लगा , अब वैसे तो सफर में हर कोई बतियाता है मगर मेरे कानों में पड़ते ही मेरा ध्यान उस ओर चला गया वो उस बुढ़िया की बता रहे थे कि किसी ने उसकी किडनी निकाल ली है ,मैनें उत्सुकता से पूछा क्या आप इसे जानते हो भैया ?
वो बोले जानते तो नहीं हैं ,मगर हम एक NGO चलाते हैं ,वहा कई बार ऐसे मरीज आते हैं उन्होंने बताया ये औरत शायद आसाम से के किसी गरीब गाँव से होगी और पैसों के लिए किडनी बेच दी होगी या कुछ व्यापारी डॉक्टरों ने इलाज क बहाने किडनी निकल ली होगी ,पर ये यहां कैसे आयी बता नहीं सकते.
मेरे पूछने पर उन्होंने उसके कमर से निचे बने एक निशान को दिखाकर बताया देखो यहां से किडनी निकाली है इसकी। अगर इसका कोई परिवार वाला होता तो हम इसकी मदद करते,पर हम भी किस किस की मदद करें।
में भौचक सा आगे बढ़ गया मन ही मन सोच रहा था न जाने क्या क्या होने लगा है, आगे से कभी डॉक्टर के जाना पड़ा तो पूरा शरीर देखभाल कर जाऊंगा नहीं तो पता चला पेट दर्द की दवाई लेने गया और डॉक्टर ने पेट ही निकाल लिया।
इतनी देर में ट्रेन रुकी आखिरी स्टेशन आ चूका था मैं उतर गया और अपने साथियों के साथ कमरे की और जाने लगा मैं स्टेशन के पास ही बानी एक बस्ती में दोस्तों के साथ रहता हूँ।
हम मस्ती कर रहे थे तभी वो बुढ़िया मेरा पीछा करती हुई वहाँ आ गए,और मुझसे चने का इशारा करने लगी मुझे उसपर दया आगे उसे थोड़े ज्यादा चने दे दिए ताकि वो भूकी ना रहे, और मै आगे बढ़ गया।
तभी वो एकदम से चिल्लाई और मेरे पीछे भागकर आगई ,वो कुछ बुदबुदा रही थी मेरी कुछ समझ नहीं आया मैं झिल्ला पड़ा और उसको भगाने लगा। पर वो नहीं मानी,मै बह जोर से भगा और सीधे कमरे में घुस गया।
रात को खाना खाकर निकला तो देखा कि वो दरवाजे के बाहर खड़ी है। अब मुझको बिलकुल समझ नहीं आ रहा था की मैं करूँ तो क्या करूँ , उसकी कहानी पता लगने के बाद मुझे उसपर दया तो आ ही चुकी थी, और में भी खुद पंद्रह साल का बच्चा ही था। मुझे नहीं याद मैं कब अपने घर वालों से दूर हुआ था। किसी गिरोह ने मुझे अगवा कर लिया था ,मुझसे भीक मंगवाते थे। वहाँ से एक अम्मा ने हमे छुड़वा लिया ट्रेन में सामान बेचती थी और हमको पढ़ाती थी।
मगर दो साल पहले उन्हें भी किसी ने मार दिया था,तबसे हम ट्रेन में माल बेचने लगे ताकि थोड़ा पढ़ लिख कर गुजर बसर कर लें।
वो बुढ़िया मुझे ऐसे देख रही थी मानो मुझे जानती हो, तभी वो आगे बढ़ी और मुझे अपने हाथ से सहलाने लगी। लग रहा था मानो उसकी ढीली खाल और नाम आँखे मुझसे पूछ रही हो "मेरे लाल तू केसा है "
मैनें उससे पूछा माई क्या चाहिए वो बुदबुदाने लगी मैने उसे अंदर बुलाया और रोटी दी ,उसने फटाफट पहला निवाला खाया फिर कुछ सोचा और एक टुकड़ा मेरे मुंह में भी रख दिया ,मेने इशारो से उसे समझाया की मै खा चूका हूँ तो वो समझ गई , उसने फटाफट से रोटी खानी शुरू करदी। रोटी खाते ही उसे जबरदस्त नींद आई और वो वहीँ लेटकर सो गई। मेरे दोस्तों ने कहा तो उनको मेने समझा लिया और अपने साथ रखने के लिए राजी कर लिया।कुछ दिन साथ रहने के बाद मैं उसकी थोड़ी बहुत बात समझने लगा था,अब वो यारी भी लगने लगी थी। एक दिन मैनें उससे उसका नाम पूछा तो बड़ा सा मुँह बनाकर बोली "बावली" शायद रेल में सब दुत्कारकर बावली ही कहते होंगे।
वैसे तो वो कुछ कर नहीं सकती थी ,मगर हमने सोचा क्यूँ न इसे फरीदाबाद स्टेटों पर भुट्टा बेचने लगा दें कुछ कमा भी लेगी और हमपर बोझ भी नहीं पड़ेगा।
और ऐसा हुआ भी,अब वो भी काम करने लगी कुछ दिन तो साथ लगना पड़ा पर भुट्टे के कितने पैसे लेने हैं और बिना पैसे भुट्टा नहीं देना ये वो सिख चुकी थी ,फिरभी आते जाते कोई न कोई निगरानी रखता था।
उसका अतीत जानने की मुझे बड़ी उत्सुकता थी, मेने भी बड़ी जुगाड़ करके स्टेशन के क्लीनर को पटाया जो हमको उसकी बात समझा सके क्युकी वो भी एक असमिया ही था।
रात को वो हमारे साथ आगया ,बातों बातों में उसने अम्मा से कुछ पूछा ,पहले तो उसे कुछ याद नहीं आ रहा था लेकिन धीरे धीरे वो खुलने लगी उसने अपनी टूटी फूटी बातों से बताया कि वो "बक्सा" जिले के "चमुआ गटी " गाँव की रहने वाली है। उसका पति जबसे उसे बिहा कर लाया वो उस गाँव से बाहर नहीं निकली ,उसके दो बेटे थे ,बड़े बेटे की शादी के बाद पति मर गया खेत ज्यादा नहीं हैं जो भी हे उससे धीरे धीरे गुजर बसर चल रहा था। वो बांस की डलिया बनकर बेचती थी, उसका एक पोता भी है जो ८ साल का है, शायद यही वो वजह थी जो ये मुझे इतना लाढ़ करती थी।
उसने यह भी बताया की उसका छोटा बीटा कहीं दूर मजदूरी करने चला गया है।
उसकी तबियत खराब हो गई थी गाँव के डॉक्टर ने उसे दिल्ली जाकर फ्री इलाज कराने को कहा साथ ही आने जाने का खर्चा भी दिया ,ऐसा उसके बड़े बेटे ने बताया था। वो हंसी ख़ुशी दिल्ली आये थे ऑपरेशन भी हुआ, जब लोटे तो स्टेशन पर वह गुम हो गई उसे कहीं भी उसका बेटा नहीं मिला ,उसने काफी ढूंढा फिर वो बेहोश हो गई ,और इससे आगे उसे कुछ नहीं पता था।
हम सब इसकी बातें जानकर हैरान हो गए।
उसकी बातों से पता चल गया कि पैसों के लिए उसके बेटे ने उसकी किडनी बेच दी थी और दवाओं से बचने के लिए उसे वहीँ छोड़ गया था। उसे लगा होगा दिल्ली में तो कोई न कोई रहम खा कर आश्रम में भेज हि देगा।
खैर हमने सब बातों को भूलना ही ठीक समझा ,जुगाड़ लगाकर उसकी दवाई का इंतजाम भी करवादिया। वो हमें बिलकुल बच्चे की तरह पुचकारती थी।
एक शाम मैं मथुरा से चला लेकिन फरीदाबाद उतर गया उसके बाद कोई लोकल नहीं थी तो सुपरफास्ट में ही चढ़ गया ,मैं चढ़ा तो देखा की रिजर्वेशन डिब्बा है। मैनें सोचा गार्ड आएगा तो देखा जाएगा ,मैं अंदर घुस गया और चने बेचने लगा ,शायद किसी ने शिकायत करदी और गार्ड आगया मुझे हड़काने लगा ,मैनें कहा की मुझे निजामुद्दीन तक ही जाना है मैं माल नहीं बेचूंगा बस निजामुद्दीन तक जाने दो।
वो एक न माना मैनें रुपये भी देने चाहे पर वो बदतमीज था,इतनी देर में ट्रैन चल पड़ी ,मैनें देखा बावली अम्मा पीछे से चढ़ आई उसने शायद मुझे देख लिया वो एक साथ बिफर गयी और गार्ड को पीटने लगी हम चलते चलते गेट तक आगये थे। ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी ,मुझे खतरे देख अम्मा जोर जोर से उसे पीट रही थी मैं अम्मा को रोकना चाह रहा था कि गार्ड ने उसे जोर से झटक दिया और वो गेट से बाहर गिर गई।
ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी काफी आगे निकल चुकी थी ,चेन खींचते खींचते मैं बहुत दूर आ चूका था ट्रेन रुकी मैं उतरा और उलटी तरफ भाग लिया दौड़ते हुए वहां तक पहुंचा जहाँ वो गिरी थी मैं जोर जोर से हांफ रहा था मेरी धड़कन तेज हो चुकी थी,मेरी नजरें उस नज़ारे पर ठहर गई थी, अम्मा मेरे आगे पड़ी हुई थी पर वो बोल नहीं रही थी बस मुस्कुरा रही थी , बिलकुल वैसे ही जैसे मेने पहली बार उसे देखा था। उसका हाथ धीरे से मेरे चेहरे पर पड़ा ,और उसकी आँख बंद हो गई , शायद उसमें इतनी ही जान बची थी या बचा रखी थी ,ताकि मुझे देख सके मैं बहुत रोया ,उसने एक हाथ में मसालेदार भुट्टा पकड़ रखा था ,शायद वो मुझे यही देने आयी थी मुझे उसने देख जो लिया था फिर रूकती कैसे अपने बच्चे पर कोई आंच भला कैसे आने देती ,उसे क्या पता था उसकी जान चली जाएगी।
वो बावली ही थी "बावली अम्मा"
***रिश्ता कुछ महीनो का था मगर अटूट था ***
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गाड़ी संख्या "६४५९३" आगरा केंट से चलकर निजामुद्दीन को जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म संख्या दो पर आ चुकी है।
मथुरा जंक्शन पर एक उद्घोष हुआ , ट्रेन रुकी और भीड़ का एक रेला अंदर की ओर लपका, जो अंदर से बाहर आना चाह रहे थे एक बार को तो वो भी वापिस घुस आए पर सब उतर और चढ़ गए।
ट्रेन चल पड़ी और मैं भी उसमे चढ़ लिया , मैं चने बेचने वाला हूँ , रोज इसी तरह चढ़ता और उतरता हूँ इन्ही ट्रेनों से।
ठेके पर तो नहीं हूँ मगर साहब को रोज के पचास रूपए देकर रोजी-रोटी चलाता हूँ।
कई लोग रोज आते जाते हैं उनमे से कुछ मेरे फिक्स ग्राहक हैं , जो थोड़े ज्यादा चने तो लेते हैं पर कमाई करा देते हैं।
"चने -चने " चिल्लाते हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे और दूसरे से और दूसरे डिब्बे में जाना पड़ता है।भीड़ बहुत होती है संतुलन बनाना आसान नहीं होता कभी कभी तो इतना बुरा हाल होता है कि खड़ा होना भी दूसरों के बक्से या बोरियो पर पड़ता है।
खैर मथुरा से फरीदाबाद ऐसे ही निकल जाता है फिर जाकर सांस आती है।
टिकट सस्ती होने की वजह से बड़े लोग भी इसी में सफर करते हैं , मगर वो कुछ धंधा नहीं कराते बल्कि पूछने पर कुछ ऐसा मुहं बनाते हैं मानलो कुछ नाजायज मांग लिया हो।
असली कमाई तो बच्चे कराते हैं जिद्द कर-कर के दो चार पत्ते तो बनवा ही लेते हैं, मगर पुलिस और बाबाजी भी बहुत हैं इसमें , कभी पल्ले पड़ जाएं तो माल का माल लेलें और पैसे के नाम पर ठेंगा दे दें।
पर मुझे तो चटोरी औरतों की तलाश रहती है ,जहाँ चार पांच एक साथ इकट्ठी हुई समझलो सौ (१००)का नोट सीधा।
पर एक समस्या और भी है कि में अकेला नहीं चढ़ता कई और भी होते हैं साथ में चिप्स वाला,खीरे वाला,चूरन वाला,और तो और चने वाले भी कई हैं फिर भी सही कमाई हो जाती है रोज के तीन सौ (३००)तो कमा ही लेता हूँ।
आज का दिन भी अच्छा ही था काफी भीड़ चढ़ी थी मैं भी चढ़ गया और आवाज लगाने लगा।
मैं दो डिब्बों में होकर तीसरे में घुसा कुछ लोगों ने चने बनवाए , तभी एक औरत ने मुझे इशारा किया वो बिलकुल पागल लग रही थी
काली-कुचली मानो कई दिनों से नहाई न हो,तन पर चीथड़े लिपटे थे ,बदहवास सी ऐसा लग रहा था मानो नशे में हो ,कभी हँसती ,कभी चीखती ,कभी लेट जाती , मैं दो बार उस डिब्बे से निकला मगर मेने उसे कुछ नहीं दया क्यूंकि वो एक भिकारी थी और मुझे कुछ नहीं देती।
कुछ भले लड़को ने उसे चने खरीदकर देदिये ,जब मैं आगे बढ़ा तो किसी ने चने बनवाए मैं रुककर चने बनाने लगा , अब वैसे तो सफर में हर कोई बतियाता है मगर मेरे कानों में पड़ते ही मेरा ध्यान उस ओर चला गया वो उस बुढ़िया की बता रहे थे कि किसी ने उसकी किडनी निकाल ली है ,मैनें उत्सुकता से पूछा क्या आप इसे जानते हो भैया ?
वो बोले जानते तो नहीं हैं ,मगर हम एक NGO चलाते हैं ,वहा कई बार ऐसे मरीज आते हैं उन्होंने बताया ये औरत शायद आसाम से के किसी गरीब गाँव से होगी और पैसों के लिए किडनी बेच दी होगी या कुछ व्यापारी डॉक्टरों ने इलाज क बहाने किडनी निकल ली होगी ,पर ये यहां कैसे आयी बता नहीं सकते.
मेरे पूछने पर उन्होंने उसके कमर से निचे बने एक निशान को दिखाकर बताया देखो यहां से किडनी निकाली है इसकी। अगर इसका कोई परिवार वाला होता तो हम इसकी मदद करते,पर हम भी किस किस की मदद करें।
में भौचक सा आगे बढ़ गया मन ही मन सोच रहा था न जाने क्या क्या होने लगा है, आगे से कभी डॉक्टर के जाना पड़ा तो पूरा शरीर देखभाल कर जाऊंगा नहीं तो पता चला पेट दर्द की दवाई लेने गया और डॉक्टर ने पेट ही निकाल लिया।
इतनी देर में ट्रेन रुकी आखिरी स्टेशन आ चूका था मैं उतर गया और अपने साथियों के साथ कमरे की और जाने लगा मैं स्टेशन के पास ही बानी एक बस्ती में दोस्तों के साथ रहता हूँ।
हम मस्ती कर रहे थे तभी वो बुढ़िया मेरा पीछा करती हुई वहाँ आ गए,और मुझसे चने का इशारा करने लगी मुझे उसपर दया आगे उसे थोड़े ज्यादा चने दे दिए ताकि वो भूकी ना रहे, और मै आगे बढ़ गया।
तभी वो एकदम से चिल्लाई और मेरे पीछे भागकर आगई ,वो कुछ बुदबुदा रही थी मेरी कुछ समझ नहीं आया मैं झिल्ला पड़ा और उसको भगाने लगा। पर वो नहीं मानी,मै बह जोर से भगा और सीधे कमरे में घुस गया।
रात को खाना खाकर निकला तो देखा कि वो दरवाजे के बाहर खड़ी है। अब मुझको बिलकुल समझ नहीं आ रहा था की मैं करूँ तो क्या करूँ , उसकी कहानी पता लगने के बाद मुझे उसपर दया तो आ ही चुकी थी, और में भी खुद पंद्रह साल का बच्चा ही था। मुझे नहीं याद मैं कब अपने घर वालों से दूर हुआ था। किसी गिरोह ने मुझे अगवा कर लिया था ,मुझसे भीक मंगवाते थे। वहाँ से एक अम्मा ने हमे छुड़वा लिया ट्रेन में सामान बेचती थी और हमको पढ़ाती थी।
मगर दो साल पहले उन्हें भी किसी ने मार दिया था,तबसे हम ट्रेन में माल बेचने लगे ताकि थोड़ा पढ़ लिख कर गुजर बसर कर लें।
वो बुढ़िया मुझे ऐसे देख रही थी मानो मुझे जानती हो, तभी वो आगे बढ़ी और मुझे अपने हाथ से सहलाने लगी। लग रहा था मानो उसकी ढीली खाल और नाम आँखे मुझसे पूछ रही हो "मेरे लाल तू केसा है "
मैनें उससे पूछा माई क्या चाहिए वो बुदबुदाने लगी मैने उसे अंदर बुलाया और रोटी दी ,उसने फटाफट पहला निवाला खाया फिर कुछ सोचा और एक टुकड़ा मेरे मुंह में भी रख दिया ,मेने इशारो से उसे समझाया की मै खा चूका हूँ तो वो समझ गई , उसने फटाफट से रोटी खानी शुरू करदी। रोटी खाते ही उसे जबरदस्त नींद आई और वो वहीँ लेटकर सो गई। मेरे दोस्तों ने कहा तो उनको मेने समझा लिया और अपने साथ रखने के लिए राजी कर लिया।कुछ दिन साथ रहने के बाद मैं उसकी थोड़ी बहुत बात समझने लगा था,अब वो यारी भी लगने लगी थी। एक दिन मैनें उससे उसका नाम पूछा तो बड़ा सा मुँह बनाकर बोली "बावली" शायद रेल में सब दुत्कारकर बावली ही कहते होंगे।
वैसे तो वो कुछ कर नहीं सकती थी ,मगर हमने सोचा क्यूँ न इसे फरीदाबाद स्टेटों पर भुट्टा बेचने लगा दें कुछ कमा भी लेगी और हमपर बोझ भी नहीं पड़ेगा।
और ऐसा हुआ भी,अब वो भी काम करने लगी कुछ दिन तो साथ लगना पड़ा पर भुट्टे के कितने पैसे लेने हैं और बिना पैसे भुट्टा नहीं देना ये वो सिख चुकी थी ,फिरभी आते जाते कोई न कोई निगरानी रखता था।
उसका अतीत जानने की मुझे बड़ी उत्सुकता थी, मेने भी बड़ी जुगाड़ करके स्टेशन के क्लीनर को पटाया जो हमको उसकी बात समझा सके क्युकी वो भी एक असमिया ही था।
रात को वो हमारे साथ आगया ,बातों बातों में उसने अम्मा से कुछ पूछा ,पहले तो उसे कुछ याद नहीं आ रहा था लेकिन धीरे धीरे वो खुलने लगी उसने अपनी टूटी फूटी बातों से बताया कि वो "बक्सा" जिले के "चमुआ गटी " गाँव की रहने वाली है। उसका पति जबसे उसे बिहा कर लाया वो उस गाँव से बाहर नहीं निकली ,उसके दो बेटे थे ,बड़े बेटे की शादी के बाद पति मर गया खेत ज्यादा नहीं हैं जो भी हे उससे धीरे धीरे गुजर बसर चल रहा था। वो बांस की डलिया बनकर बेचती थी, उसका एक पोता भी है जो ८ साल का है, शायद यही वो वजह थी जो ये मुझे इतना लाढ़ करती थी।
उसने यह भी बताया की उसका छोटा बीटा कहीं दूर मजदूरी करने चला गया है।
उसकी तबियत खराब हो गई थी गाँव के डॉक्टर ने उसे दिल्ली जाकर फ्री इलाज कराने को कहा साथ ही आने जाने का खर्चा भी दिया ,ऐसा उसके बड़े बेटे ने बताया था। वो हंसी ख़ुशी दिल्ली आये थे ऑपरेशन भी हुआ, जब लोटे तो स्टेशन पर वह गुम हो गई उसे कहीं भी उसका बेटा नहीं मिला ,उसने काफी ढूंढा फिर वो बेहोश हो गई ,और इससे आगे उसे कुछ नहीं पता था।
हम सब इसकी बातें जानकर हैरान हो गए।
उसकी बातों से पता चल गया कि पैसों के लिए उसके बेटे ने उसकी किडनी बेच दी थी और दवाओं से बचने के लिए उसे वहीँ छोड़ गया था। उसे लगा होगा दिल्ली में तो कोई न कोई रहम खा कर आश्रम में भेज हि देगा।
खैर हमने सब बातों को भूलना ही ठीक समझा ,जुगाड़ लगाकर उसकी दवाई का इंतजाम भी करवादिया। वो हमें बिलकुल बच्चे की तरह पुचकारती थी।
एक शाम मैं मथुरा से चला लेकिन फरीदाबाद उतर गया उसके बाद कोई लोकल नहीं थी तो सुपरफास्ट में ही चढ़ गया ,मैं चढ़ा तो देखा की रिजर्वेशन डिब्बा है। मैनें सोचा गार्ड आएगा तो देखा जाएगा ,मैं अंदर घुस गया और चने बेचने लगा ,शायद किसी ने शिकायत करदी और गार्ड आगया मुझे हड़काने लगा ,मैनें कहा की मुझे निजामुद्दीन तक ही जाना है मैं माल नहीं बेचूंगा बस निजामुद्दीन तक जाने दो।
वो एक न माना मैनें रुपये भी देने चाहे पर वो बदतमीज था,इतनी देर में ट्रैन चल पड़ी ,मैनें देखा बावली अम्मा पीछे से चढ़ आई उसने शायद मुझे देख लिया वो एक साथ बिफर गयी और गार्ड को पीटने लगी हम चलते चलते गेट तक आगये थे। ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी ,मुझे खतरे देख अम्मा जोर जोर से उसे पीट रही थी मैं अम्मा को रोकना चाह रहा था कि गार्ड ने उसे जोर से झटक दिया और वो गेट से बाहर गिर गई।
ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी काफी आगे निकल चुकी थी ,चेन खींचते खींचते मैं बहुत दूर आ चूका था ट्रेन रुकी मैं उतरा और उलटी तरफ भाग लिया दौड़ते हुए वहां तक पहुंचा जहाँ वो गिरी थी मैं जोर जोर से हांफ रहा था मेरी धड़कन तेज हो चुकी थी,मेरी नजरें उस नज़ारे पर ठहर गई थी, अम्मा मेरे आगे पड़ी हुई थी पर वो बोल नहीं रही थी बस मुस्कुरा रही थी , बिलकुल वैसे ही जैसे मेने पहली बार उसे देखा था। उसका हाथ धीरे से मेरे चेहरे पर पड़ा ,और उसकी आँख बंद हो गई , शायद उसमें इतनी ही जान बची थी या बचा रखी थी ,ताकि मुझे देख सके मैं बहुत रोया ,उसने एक हाथ में मसालेदार भुट्टा पकड़ रखा था ,शायद वो मुझे यही देने आयी थी मुझे उसने देख जो लिया था फिर रूकती कैसे अपने बच्चे पर कोई आंच भला कैसे आने देती ,उसे क्या पता था उसकी जान चली जाएगी।
वो बावली ही थी "बावली अम्मा"
***रिश्ता कुछ महीनो का था मगर अटूट था ***
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