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Sunday, April 12, 2020

एक बिछड़ा हुआ स्टेशन

एक बिछड़ा हुआ स्टेशन 
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सुबह के तक़रीबन ७:३० बजे थे ,राहुल अपनी  बीवी सोनम के साथ देहरादून जा रहा था। उसका तीन साल का बेटा और डेढ़ साल की बेटी साथ थी। राहुल एक इलेक्ट्रिशियन था ठेके लेता था ,दूद दूर जाता था बड़ी बड़ी बिल्डिंगों का काम करने। वैसे तो वो मध्यप्रदेश के सागर का था ,मगर रहता आगरा में था। वहीँ से दिल्ली ,नोएडा ,गुड़गाँव ,फरीदाबाद के काम मिल जाते थे। 

                                                               हर जगह परिवार को साथ नहीं लेकर जा सकते थे इसलिए वो आगरा में ही रहता था ,लेकिन देहरादून दूर था ऊपर से बीवी ने जिद करदी थी की वो दून घूमने जाएगी। उसने अन्तर_सिटी ऐ दिल्ली जाने का सोच रखा था, टर्न समय से एक घंटा देरी से थी (अक्सर सर्दियों में ऐसा हो जाता हे ) 
काफी देर स्टेशन पर बिताने के बाद ट्रेन आने का उद्घोष हुआ। ट्रेन नियत स्थान पर रुकी और लोगों ने उसमे चढ़ना शुरू करदिया। वे दोनों भी चढ़ गए ,ट्रेन में चढ़ते ही दोनों ने सीट ढूंढी और बेठ गए। बच्चे तो सफर में कुछ चंचल हो ही जाते हैं,दोनों बच्चे गॉदी से उतरकर इधर उधर दौड़ने लगे। तभी ट्रेन चल पड़ी सोनम ने दोनों को पकड़ा और लताड़ लगाई।

 सर्दी की सुबह ऊपर से कोहरा ट्रेन इंच-इंच सरक रही थी ,कुछ एक घंटा चलकर भी ट्रेन रुनकता तक ही पहुँच पाई थी। और दिल्लीअभी बहुत दूर थी।

बच्चे सो गए थे ,संग लाया खाना खाया जा चूका था। ट्रेन में बैठे लोग आपस में पंचायती कर रहे थे। कोई बोल रहा था अबतक तो पैदल ही पहुंच जाते ,तो कोई बोल रहा था सरकार को काम से काम बढ़िया सी अदरक की चाय तो मुफ्त बटवानीं ही चाहिए।
लगभग दस बज रहे होंगे ट्रेन मथुरा जंक्शन पर आकर रुकी यहाँ से ट्रेन में भीड़ थोड़ी और बढ़ गई ट्रेन चली तो ,मगर आउटर पर ही कड़ी हो गई। लगभग आधा घंटा खड़ा रहने के बाद वो आगे चली। काफी देर तक चलने के बाद छाता आया ,वहां पर  प्रकोप थोड़ा कम सा हो गया था। राहुल ने सोचा जाकर पानी भर लाए कुछ खाने को भी ले आए, वो सीट से उठा ही था की उसका बीटा जाग गया,पिता को जाता देख कच्ची नींद में वो रोने लगा ,राहुल ने बाहर निकलकर उसे छेड़ने के लिए आवाज लगादी जिसे सुनकर वो और जोर जोर से रोने लगा ,सोनम ने राहुल से उसे साथ ले जाने को कहा तो राहुल ने उसे मना करने को कहा लेकिन मुहं में तम्बाकू की पीक होने के कारण वह उसका उत्तर समझ नहीं पायी।

उसने पास खड़े एक व्यक्ति से उसे बाहर पिता तक छोड़ने को कहा ,वह व्यक्ति उस बच्चे को लेकर बहार गया और उसके पिता की तरफ इशारा करके वापिस अंदर आगया ,उसने सोचा बच्चा खुद चला जाएगा या उसका पिता उसे देख लेगा।

बच्चा जबतक राहुल तक पहुँचता राहुल उसपर बिना ध्यान दिए आगे बढ़ गया ,पानी भरकर वह किसी चीज की तलाश में भीड़ की तरफ बढ़ गया ,बच्चा उसके पीछे पीछे हो लिया ,वह जो आवाज निकल रहा था वो राहुल तक नहीं पहुंच रही थी। अचानक ट्रेन चल पड़ी सोनम ने खिड़की से झांका तो देखा राहुल ने दौड़कर ट्रेन पकड़ ली है। राहुल वही गेट पर खड़े होकर सिगरेट के काश लेने लगा। लगभग बारह बजने को थे ,सब साफ दिखाई दे रहा था , ट्रेन ने भी अब रफ़्तार पकड़ ली थी

ट्रेन कई छोटे स्टेशन पार कर चुकी थी मगर राहुल को सिगरेट और गप्पों से फुरसत नहीं मिल रही थी। फरीदाबाद आने को था राहुल ने एक गुटके का पैकेट फाड़ा मुँह में रखा और सोनम की तरफ आया।
राहुल को अकेला आता देख सोनम चौंक गयी उसने राहुल से बच्चे के बारे में पूछा। राहुल उन सब बातों से अनजान था , सोनम ने उसे हर बात बताई की कैसे उसने रट बच्चे को बाहर भेजा था। राहुल के हाथ , पाँव फूल गए ,वह सोनम पर बरस पड़ा वो बेचारी खुद बिलख रही थी ,लोगों ने बिच बचाव कर मामला शांत किया और राहुल को समझाया की फरीदाबाद उतरकर स्टेशन मास्टर से छाता फ़ोन करवादे ताकि वो लोग बच्चे को ढूंढ सके।

राहुल और सोनम फरीदाबाद उतरगये ,भाग कर स्टेशन मास्टर से मिले और सारी बात बताई ,स्टेशन मास्टर ने छाता  फोन किया और सारी स्तिथि को स्पष्ट किया।

स्टेशन मास्टर ने राहुल से कहा की मेरी बात हो गयी हैं G.R.P वालो को बता दिया है वो तुरंत कार्यवाही करेंगे ,तुम जल्दी से वापिस जाओ वहां जाकर स्टेशन मास्टर से मिलना वही आगे की सारी कार्यवाही करेंगे।

और चिंता मत करो बच्चा मिल जाएगा।
दोनों स्टेशन से बाहर निकले और बस में बैठ गए।

(जब राहुल और सोनम स्टेशन मास्टर से मदद मांग रहे थे उसी वक़्त बच्चा छाता में स्टेशन से दूर जा चूका था जिससे उस्तक मदद नहीं पहुंची )

उधर बच्चा अब समझ गया था की वो अपने परिवार से बिछड़ गया है।  वह बस दूसरों के क़दमों का पीछा करते हुए इधर उधर भटक रहा था। मगर कहीं भी अपने माता पिता को नहीं ढूंढ पा रहा था। अबोध बालक ऊँ -ऊँ  की आवाज निकालता हाथ हिलाता मानो अपने माता पिता को अपने पास बुला रहा हो।

जब कुछ समझ न आया वो जोर जोर से रोने लगा प्लेटफॉर्म की शेड से काफी दूर निकल आया था वो।
रोटा , सबकी लेता , आ -आ की आवाजें निकलता , कोई उसे देख भी लेता तो वही किसी भिखारी का बच्चा समझकर नजरअंदाज करके चला जाता , इतना वक़्त होता ही कहाँ हे किसी के पास।

तभी वहां से एक कूड़ा बीनने वाली लड़की निकली उसने जब रोते बिलखते बच्चे को देखा तो वह सहज उसके पास आगयी। वह अपने ठेले को एकतरफ रख बच्चे को चुप कराकर बहलाने के लिए बैठ गयी।
डरा -घबराया बच्चा जल्द ही लड़की के साथ सहज हो गया , लड़की ने उसे लाकर पानी भी दिया बच्चे ने झट से उसे पी लिया। बच्चा अब शांत था , लड़की उससे बाय करके चलने लगी तो वह रो पड़ा लड़की ने उसे फिरसे खिलाना शुरू करदिया।  इसबार लड़की ने चुपचाप जाने का सोचा तो बच्चा भी पीछे-पीछा करने लगा ,वह शायद उस लड़की के साथ अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रहा था या फिर वह खेलने के मन से ऐसा कर रहा था। 

(बच्चे की प्रवत्ति को हम भांप नहीं सकते)

लड़की उसे हंसकर  डांटती या पीछा छुड़ाना चाहती फिर भी वह उसके पीछे चले जा रहा था। कई बार ऐसा हुआ, लड़की ने खीझकर बोला "चल जा अपनी मम्मी के पास" मेरे पीछे क्यों आता है चल जा।
मम्मी का नाम सुनते ही वो भौंचक हो गया जिस बात को वह भूल सा गया था वो फिर उसके याद आ गयी थी ,अब वह फिर से रोने बिलखने लगा। लड़की ज्यादा बड़ी नहीं थी लगभग सात साल की रही होगी ,बाल मन में ही बोली अच्छा रो मत चल और उसे अपना हाथ पकड़ कर अपने घर की तरफ ले गई।
                                                      वहीँ स्टेशन के पीछे था उसका घर , घर क्या था रेलवे की जमीन पर बानी बस्ती में बांस के पिंजर पर पिन्नियां चढ़ी हुईं थी बस सर छुपाने का इंतजाम भर था वो।
वह घर के अंदर घुसी , अंदर माँ रसोई बना रही थी , उसने बच्चे को देख कर पूछा की किसका बच्चा है वह, तब लड़की ने साड़ी बात बतादि की कैसे वह बच्चोसे स्टेशन पर रोटा हुआ मिला, और उसे छोड़ ही नहीं रहा।
लड़के ने जैसे ही चूल्हे पर रोटी को देखा वह तुरंत भाग कर आया और रोटी की तरफ इशारा करके ऊँगली को अपनी और करने लगा (ऐसा करके वह समझाना चाह रहा था की उसे भूक लगी है)
उस औरत ने भांप लिया की बिछड़ चूका है, साथ ही उसे भूक भी लगी है,वह सब बातों को छोड़ सबसे पहले बच्चे को खाना खिलाती है ,
(दूसरी तरफ)
शाम होने को थी राहुल छाता आ चुका था। उसने  दौड़ दौड़ कर सब और देखा मगर बच्चा कहीं नहीं मिला।
मिलता भी कैसे समय ने अपने पास जो दाल दिए थे। देर रात जबतक हिम्मत थी बच्चे को ढूंढा गया। छाता स्टेशन के अधिकारी भी अपने स्तर से लगे हुए थे। देर रात जब सफलता हासिल नहीं हुई स्टेशन मास्टर राहुल के पास आए और सामझाया की हम लोग पूरी हिम्मत से ढूंढ रहे हैं , तुम अब जाओ  कुछ पता लगेगा हम तुम्हे बता देंगे। स्टेशन मास्टर ने एक और बात  कही जिसे सुनकर दोनों दंग रह गए, उन्होंने बताया अगर बच्चा रात में नहीं मिलता तो हम सुबह रिपोर्ट लिखलेंगे होसकता है बच्चे को बच्चा चोर गैंग ले गया हो। 
 दोनों का ही मन नहीं माना और वो पूरी रात इधर उधर घूमते रहे और ढूंढते रहे। लेकिन कोई भी सफलता हासिल नहीं हुई। 
ठण्ड ऊपर से इतना लंबा समय हो गया था उनकी लड़की भी रोने लगी थी , वो सब भी थक गए थे। 
उन्होंने एक दिवार का सहारा लिया और वहीँ सो गए। सुबह हो गई वो उठे... सोनम अब भी बावलो की तरह रो रही थी। लेकिन राहुल ने फैसला कर लिया था की अब कुछ नहीं हो सकता अब हमे आगे बढ़ जाना चाहिए। 

उसने सोनम से कहा मुन्ना मिलना होता तो अबतक मिल जाता।  एक बार दुबारा स्टेशन मास्टर क पास चलते हैं उन्हें बताकर निकल चलते हैं , अगर नियति ने चाहा तो मुन्ना दुबारा जरूर मिलेगा। 
सोनम उसकी बात को नहीं समझ पा रही थी, लेकिन बार बार राहुल के समझाने पर वो बेमन संग चल पड़ी। आखिर उसके पास भी कोई चारा नहीं था। 
जब वो ऑफिस में गए तो पता चला ड्यूटी बदल गयी है,मगर वह सारी बाते बता कर गए हैं। राहुल ने अपना फैसला बता दिया , और बच्चे का हुलिया, रंग , फोटो उन्हें देदी लेकिन उनके पास सम्पर्क करने का साधन नहीं था।  राहुल ने बताया की कोई भी जानकारी हो आप देहरादून स्टेशन पर दे देना में वहीँ से आपसे संपर्क करलूँगा। 
ये कहकर दोनों आगे के अपने सफर पर निकल पड़े। 

उधर बच्चा अब भी उसी झोंपड़ी में था।  उस कूड़ा बीनने वाली के साथ काफी हिल मिल गया था। बच्ची की माँ ने कई बार कहा की  बार देख तो आ कहीं इसके माँ बाप इसे ढूंढ तो नहीं रहे ,उसपर लड़की ने उसे अपने साथ ही रखने को कहा। वह नोली माँ ये कितना प्यारा है और मेरा कोई भाई भी तो नहीं है,हम इसे अपने पास ही रखेंगे ,उसकी माँ ने उसकी बात पर गौर नहीं किया और खुद ही स्टेशन जाने का फैसला लिया उसने कुछ मिलने वालों से किसी  गायब होने के बारे में पता लगवाया ,तब उसे पता लगा की एक बच्चा चोरी हुआ है उसे बच्चा चोर गैंग ले गया है। पुलिस गैंग के लोगों को ढूंढ रही है। 
यह सुनकर वह दर गयी कहीं पुलिस उसे भी बच्चा चोर ना समझ ले , वैसे भी इतनी मुश्किल भरी जिंदगी है उनकी। 
वह औरत बड़ी दुविधा में थी , उसके पास बच्चा था जिसके मान बाप कोई पता नहीं था। वह बच्चे को चाहकर भी नहीं लोटा पायी, वह घर की तरफ चलने लगी कई बाते उसके मन में चल रही थी। बच्चा अकेला केसे रहेगा।  उसके माँ बाप ने अपना पता भी नहीं दिया है जिससे वो उनतक जा सके,बिना बच्चे के उसकी माँ का क्या हाल होगा।वो आगे क्या करे उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था। कि तभी उसे अपनी बेटी की कही एक बात मन में गूंजी "माँ इसको हम अपने साथ ही रखलें"

वह रुकी थोड़ी देर सोचा फिर ठाना शायद ईश्वर भी यही चाहते हैं ,तभी ऐसा हुआ मैं यशोदा बन उसका पालन पोषण करुँगी। शायद इसलिए ही वो मेरे पास आया है। 
वो झोंपड़ी में पहुंची सामने देखा बच्चा लड़की के साथ ख़ुशी ख़ुशी खेल रहा है,  निर्णय कर लिया की वो इस बच्चे को पालेगी. झोपडी में अंदर घुसी तो लड़की ने पूछा क्या हुआ माँ 
औरत पलट कर बोली कुछ नहीं बेटा आज से ये तेरा भाई हे और अब ये हमारे साथ ही रहेगा। 
लेकिन एक बात याद रखना कभी किसी को मत बताना ये तुम्हे कहाँ से मिला था। 
लड़की ने हाँ में सर हिलाया ,उसने चहक कर लड़के को गोद  में भर लिया और जोर जोर से बोली तू आजसे मेरा भाई है , लेकिन माँ हम इसे क्या बुलाएंगे हमें तो इसका नाम पता ही नहीं है। 
माँ ने जवाब दिया है न इसका नाम "कृष्णा"
यह सुनकर लड़की उछलने लगी और गॉड में बैठे भाई से बोलने लगी कृष्णा अरे मेरे कृष्णा आज से तू मेरा भाई और में तेरी बहन। उस  मैले कपड़े और सूखे बालों वाली लड़की के चेहरे पर ख़ुशी किसी प्रतियोगिता में जीते ईनाम से कम न थी। 

उसकी माँ ने ख़ुशी मनाने के लिए झटपट  चूल्हा चेताया बासी चावल से खीर बनाई और फिर तीनों ने मिलकर ख़ुशी ख़ुशी खाई। उनके घर का माहौल उत्स्व जैसा लग रहा था। 

वह महिला स्टेशन के दूसरी तरफ बन रही बस्ती में नौकरी करती थी घर घर झाड़ू पोंछा करना बर्तन मांजना  से ही उसका गुजर बसर चल रहा था। लड़की प्लास्टिक इकठ्ठा कर लेती थी और जो मिल जाता उसे माँ को दे देती थी। घर में और कोई भी नहीं था। 
                                   समय अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता रहा साल दो साल कृष्णा  बहन के साथ कूड़ा बीनने जाने लगा ,छोटा सा थैला बहन उसके गले में टांग देती और चल पड़ते दोनों प्लास्टिक बीनने के लिए , शाम को दोनों  में ही लगने वाली क्लास लिया करते थे जिसमे रेलवे के ही कर्मचारी पढ़ाया करते थे। 

(समय और आगे बढ़ता है )
कृष्णा लगभग आठ साल का हो गया ,वह मस्ताखोर था , अब वह कभी कभी अकेला भी जाने लगा , पटरियों पर चलने और ट्रेन के आने जाने का उसे ज्ञान हो चुका था।  स्टेशन पर उछलकूद करते हुए रेलिंग और सीढ़ियों पर मटकते हुए वह प्लास्टिक की बोतले इकठ्ठा करता था। 
एक बार कृष्णा ने देखा कुछ करतब करने वाले छोटे-छोटे बच्चे करतब कर रहे हैं। छोटी सी ढोलक बजा रहे हैं ,कलामण्डी खा रहे हैं ,छोटे से लोहे के चले से खुदको निकल रहे हैं। उसे बड़ा मजा आया , उसके मन में भी कुछ ऐसा करने का हुआ उसने एक प्लास्टिक की एक गोल कैन को पकड़ लिया कहीं से डंडी उठाई और खूब जोर जोर से गाकर उसे पीटने लगा ,उसकी  देख सब खूब हसे। 
हाल यह होगया की वो प्लेटफार्म पर भी कलामण्डी करता कैन पीटता और खूब गाने गाता ,और प्लास्टिक बीनता। 
 हर रोज  की तरह वो प्लेटफार्म पर था एक ट्रेन आकर रुकी , उसमे से एक दम्पति बाहर निकले  वो कोई और नहीं राहुल और सोनम ही थे। 
राहुल को किसी स्कूल का ठेका मिला था इसलिए ही वो वहां आये थे। राहुल अब अच्छा कमाने लहा था उसके दिन बदल चुके थे। उनके साथ तीन बच्चे भी थे। दोनों के पास सामान ज्यादा था ,इसलिए राहुल सोनम और बच्चों को एक सीट पर बिठा कर बाहर रिक्शा लेने चला गया। सोनम के चेहरे पर एक अजीब सा ही भाव था जैसे वो किसी को ढूंढ रही हो। भला क्यू न माँ जो थी अपने बिछड़े हुए बच्चे को एक बार फिर तलाश रही थी कहीं मिल जाए ,तभी अचानक एक मस्तमौला लड़का पटरी से प्लेटफार्म पर चढ़ा ,चढ़ते ही पैर फैलाकर  की कैन पीटने लगा शोर मचाने लगा ,सोनम की नजर उसपर ठहर गयीं। वो चाहकर भी उसपर से नजर नहीं हटा पा रही थी। 
उस गंदे कुचैले कपड़ों और चितकबरी सी हुई शक्ल के बीच भी  ममत्व ने दिल को पसीज दिया वह भर आयी थी भाव से मगर दिमाग शिथिल था वह उसकी हरकतों को देखकर उसी में ही डूब चुकी थी वह एकटक उसे ही निहार रही थी मानो उसकी माँ की नजरे अपनी प्यास बुझा रहीं हों। उसकी धड़कनो के बीच जो खालीपन था वो लम्हा उस खालिस्थान को भर रहा था। 
सहसा कृष्णा सोनम के पास आया और सीट पर पड़ी दो बोतलों को झटके से उठाया उन्हें पिचकाया ,रगड़ कर बजाय फिर थैले में ठूंस दिया। सोनम यह सब बस देखे जा रही थी उसे संसार का ज़रा भी होश नहीं था। तभी उसके शरीर पर छोटे से हाथ का एक हल्का धक्का लगा , उसकी तंद्रा टूटी मानो वो किसी और दुनिया से वापिस लौटी हो , उसने देखा उसकी चार साल की बेटी उससे बैग में राखी मठरी मांग रही थी , ध्यान को दूसरी तरफ कर वो बैग में रखे टिफिन में से मठरी देने लगी तो बाकी बच्चों ने भी मठरी मांग ली। उसने एक एक मठरी तीनों को दी और एक अपने लिए निकाल कर टिफिन बंद कर अंदर रखा।  
जैसे ही उसने मुँह ऊपर किया उसने देखा कृष्णा एक चबूतरे पर बैठ कर उन्हें ही घूर रहा था ,सोनम एक एक गस्सा खाती और  हर बार कृष्णा की तरफ देखती।  वो उससे नजरें बचाने की सोच रही थी मगर चाहकर भी नहीं कर पा रही थी। 
(कृष्णा भूखा था या ,कृष्णा का मन भी मठरी देखकर ललचा गया ,या वो बच्चों को देख रहा था )

अपनी और  हुए कृष्णा को सोनम ने अपने पास बुलाने का एक हल्का सा इशारा दिया कृष्णा तुरंत वहां आ गया , सोनम ने उसे भी एक मठरी देदी, मठरी लेकर वो काफी खुश हुआ और अपनी कैन को लेकर पीटने लगा यहाँ वहां कूदने लगा , सोनम भी ये सब देखकर खुश महसूस कर रही थी आखिर उसकी सालों की भूक जो मिट रही थी ,वो तो यह जानती भी नहीं थी की वही उसका मुन्ना है। तभी राहुल वहां आगया और चलने के लिए बोला , सोनम बड़े अटपटे से भाव से उठी कुछ सोचा और बोली "सुनो आप चलो मैं इसे कुछ लड्डू मठरी देकर आती हूँ "

राहुल तपाक से बोला "पागल हो क्या खाली बैठे लूत गले लगा रही हो " "एक को दोगी दस और आ जाएंगे " अब चलो रिक्शा बहार खड़ा है।  यह कहकर वो बड़े बैग ,बड़ी लड़की और लड़के को साथ लेकर बहार निकल लिया। फिर भी सोनम का मन नहीं माना उसने झट से टिफिन खोला कुछ लड्डू मठरी निकाले और उसे दे दिए , ये देख  कृष्णा चौंककर अरे वाह बोला और सोनम को "थैंकू " बोला सोनम ये सुन खूब हंसी। राहुल वापिस आया और सब देखकर खीझ गया और जोर से बोला "अब चलो भी या सबकुछ दान करके ही आओगी"
सोनम  तुरंत अपने आप को समेटा और बच्चे को गोद में लेकर बाहर की ओर चल पड़ी , जाते जाते कृष्णा ने हाथ हिलाते हुए उसे बाय भी किया।
(दृश्य लगभग वो सालो पहले जैसा ही होगया बच्चा जब हाथ हिलाकर बुला रहा था आज जाने दे रहा है)

बाहर निकलकर देखा राहुल उसका  इन्तजार कर रहा है , वो झट से रिक्शे में बैठ गयी , राहुल ने उसकी तरफ देखा और बोला तुम्हे कितनी बार समझाया  है कि किसी को भी ऐसे मत पास बुलाया करो अब पर्स-वर्स  चेक कर लो कहीं पार ना हो गया हो। 
(सोनम ने सर निचे झुकाया फिर आराम से ऊपर उठाया और बोली )
"सुनो जी "    " अपना मुन्ना संग होता तो लगभग उस बच्चे के जितना ही बड़ा होता ना"। 
राहुल के चेहरे पर एक घनी चुप्पी आ जाती है। मगर सोनम के मन में शांति है वो तृप्त है। 

अब रिक्शा भी अपनी मंजिल की और चल देता है। 

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गगन टांकड़ा 
(२४-०२-२०२०)
























































































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