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Tuesday, May 5, 2020

भूल कर जहां की बंदिशें


भूल कर जहां की बंदिशें 
↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢


भूल कर जहां की बंदिशें..... 
में छोड़ चला घर-बार। 

लिपट के सनम से..... 
चूमा उन्हें कई बार। 

समेटा जो उन्होंने अपनी बाँहों में.....  
बंद आँखे मेरी हो गयीं। 

जो आँखें खुली तो उनकी..... 
झूठ की तसवीर साफ़ हो गयीं। 

ना तो थे वो और ना हीं था वो..... 
ख़ुशी का  मंजर जो कल रात में था। 

अब बाज़ारू था में........ 
हर रोज मेरा जिस्म बिक रहा। 

↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢↢
गगन टांकड़ा
(२९-०३-२०१७)

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