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Tuesday, June 9, 2020

ना तो तुम

ना तो तुम तेज बरसात से हो... 
   जो जिस्म को तर बतर कर जाती है। 

तुम बदली हवाओं सी भी नहीं.... 
    जो मन को महका जाती है। 

तुम उस मध्दम बरसती आब की फुहार सी हो... 
    जब भी आती हो ..... रूह को जगा जाती हो। 

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गगन टांकड़ा 
(२५-०७-१९)

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