ना तो तुम तेज बरसात से हो...
जो जिस्म को तर बतर कर जाती है।
तुम बदली हवाओं सी भी नहीं....
जो मन को महका जाती है।
तुम उस मध्दम बरसती आब की फुहार सी हो...
जब भी आती हो ..... रूह को जगा जाती हो।
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गगन टांकड़ा
(२५-०७-१९)
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