इस जिस्म में अब बसी बस तुम ही तुम हो
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हाँ तुम हो, हाँ तुम ही हो,,,
मेरे ख्वाबों खयालों में तुम हो,,
तुम मेरे जीने की वजह
मरने के बाद जन्नत का अरमान तुम हो।
तुम ही रहते हो मेरी नब्ज और दिल मे,
तुम ही बहती हो श्याही बनकर मेरी कलम से।
तुम ही हर हर्फ़ हर नज्म की वजह(प्रेरणा) हो।
तुम हर पन्नो पर लिखने की वजह हो।
तुम ही आगाज और तुम ही हो अंत हर किताब का,,,
जिसकी हर लिखावट सिर्फ तुम हो।
अब में खुद को खुद का या किसी औऱ का नही कहता,,,
इस जिस्म में अब बसी बस तुम ही तुम हो।
इस जिस्म में अब बसी बस तुम ही तुम हो।
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गगन टाँकड
(10/10/19)
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