दिल्ली मेट्रो
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मंगलवार का दिन था,लगभग तीन बजने को थे मुझे फरीदाबाद से शहादरा जाना था ,गर्मी के दिन थे ,सोचा मेट्रो से निकल चलूँ नयी नयी सुविधा शुरू हुई थी और ऊपर से रास्ता भी ठण्ड में गुजर जाएगा।
मैनें १६ सेक्टर स्थित निवास स्थान से रिक्शा किया जिसने मुझे मेट्रो स्टेशन के गेट पर छोड़ दिया ,मैनें सीढियाँ पकड़ीं और ऊपर के तल की तरफ गया ,टिकिट काउंटर से टोकन लेकर चैकिंग प्लेटफॉर्म तक गया। बैग को स्कैनर में डालकर मैं चैकिंग करा कर जैसे ही मैं आगे बढ़ा मेरा पैर चिकने फर्श पर फिसला जिसे साइड में खड़े सुरक्षा कर्मी की सहायता रोका ,और इसी के साथ मेरी मेट्रो की यात्रा शुरू हुई।
मैंने बैग उठाया और आगे बढ़ गया वहां का साफ़ सुथरा और स्वच्छ माहौल देख मेरा दिल खुश हो गया ,मुझे आश्चर्य हुआ जो लोग बाहर बेतरतीब व्यवहार और असभ्य होते हैं वह अंदर आते ही "इलीट क्लास" में तब्दील हो जाते हैं।
चप्पे-चप्पे पर सिक्युरिटी देख खुद को कुछ ज्यादा ही सिक्योर महसूस हो रहा था। साफ़ सुथरा फर्श हर तरफ दीवारों पर कुछ चित्रकारी ,सुगमता के लिए स्वचालित सीढियां ,व्यवस्थित स्टाफ व् सुरक्षित माहौल। वह छवी मेरे जेहन में आजभी बसी है। और भला हो भी क्यों न मेरा पहला सफर जो था। भारतीय रेल से ये सफर बिलकुल अलग था।
मुझे एक बात बताने में असहजता हो रही है,मैं स्वचालित सीढ़ियों पर चढ़ते समय पीछे लुढ़कते लुढ़कते बचा था ,पहली बार जो था। ऊपर पहुंचकर सीढ़ियों से कूदकर उतरना भी किसी महाभारत से कम नहीं था।
चलो ऊपर भी पहुँच गए,और वहाँ इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना देखकर हतप्रभ रह गया। खम्बों पर खड़ी इस इमारत में प्लेटफॉर्म काफी बड़े थे। पटरियां दूर तक आती जाती दिख रहीं थी। तभी एक रौशनी आती दिखी ,सबलोग हरकत में आ गए ट्रेन पर यात्रा का रुट डिजिटल पट्टी पर आराम से पढ़ा जा सकता था ,ट्रेन नियत स्थान पर आकर रुकी ,दरवाजे खुले ,लोग तेज कदम चाल से अंदर गए और नेत्रों से चिन्हित पसंदीदा स्थान पर बैठ गए। क्यूंकि ट्रेन यहीं से बनकर चली थी तो सीट आराम से मिल गयी और वो भी विंडो (एक अनौपचारिक अनावश्यक सोच )
जितना कुछ मैं बहार देखकर प्रसन्न था उससे ज्यादा अंदर आकर प्रसन्न हो गया। सभी तरफ पूरा उजाला था (एम्बिएंस दिन के हिसाब से सेट था ),पूर्ण वातानुकूलित केबिन की ठंडक ने मेरे पसीनो को पलों में सूखा दिया और मेरे मन को भी शांत किया।
इन सबके बीच मेट्रो अगले स्टॉप पर पहुंच चुकी थी जिसका पता लगा मुझे ऑडियो अनाउंसमेंट से लगा जो की बिलकुल स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी। वरना भारतीय रेल में तो कई बार कान को भी ये पता करना पड़ता है की भला आवाज आयी भी तो कहाँ से।
LED डिस्प्ले हो या ऑटोमैटिक गेट ,पोल हों या खड़े यात्रियों के लिए हैंगर सबकुछ किसी अलग देश में आने का आभास करा रहे थे।
तभी मेरा गौर गया एक हरी पट्टी पर जिसपर लिखा था "महिलाओं के लिए आरक्षित", "विकलांगों के लिए आरक्षित" ,"वृद्धों के लिए आरक्षित " ,"ब्रेल "में लिखे बोर्ड लगे थे ताकि दृष्टि बधिरों को आसानी रहे। यह सब देखकर सुकून मिल रहा था।
कई स्टेशन निकल चुके थे ,सब कुछ सुखद था ,ट्रेन लगभग खाली ही थी मुझे लगा बस ऐसा ही माहौल रहेगा। मैनें बगल वाले यात्री से पूछा क्या ये ट्रेन ऐसे ही खाली रहती है। उसने कोई जवाब नहीं दिया ,मैनें थोड़ा हाथ हिलाया और फिरसे पूछा ,अबके वो हिला और अपने कानों से मोबाईल हैंड फ्री निकाल कर बोला नहीं ,बल्कि थोड़ी देर में इतनी भीड़ हो जाएगी की निकलना है या उतरना पता ही नहीं चलेगा। उसने ऐसा मुझे डराने के लिए बोला या नहीं उसका पता मुझे थोड़ी ही देर में लगने वाला था।
लेकिन उसी वक़्त जो मुझे पता चला वो ये था की लगभग हर युवा ,महिला, प्रौढ़ के हाथ में एक स्मार्ट फ़ोन था जिसमे वो या तो गेम खेल रहे थे या गाने सुन रहे थे ,वीडियो देख रहे थे , कुछ नहीं तो सोशयल मिडिया पर चैट पर लगे हुए थे।
यारी-दोस्ती ,रिश्ते-नाते,चेतना-सम्मान सब नगण्य था वहाँ पर। वहाँ कुछ था तो वो था एक अभूतपूर्व सन्नाटा ,मेट्रो के मोटर की आवाज को तो आराम से सूना जा सकता था। क़दमों की आहात हो या दूर किसी के मोबाइल की घंटी सबकुछ सुना जा सकता था।
इन सब समस्याओं के बीच ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुंची ,कई लोग अंदर आए और अपनी -अपनी राह पकड़ ली ,मगर मैं कुछ लोगों पर चाहकर भी अपनी नजर पड़ने से नहीं रोक पा रहा था। तीन लड़के और एक लड़की ,देखकर लगरहा था शायद किसी शिक्षण संस्थान से आ रहे थे।
बड़े खिलखिलाकर अपने शिक्षक और सहपाठियों की बाते कर रहे थे। मैनें देखा उनमे से एक लड़के ने लड़की के दोनों हाथों को पोल पर जकड़ा हुआ था, और लड़की खिलखिलाकर हंस रही थी।
दोनों धीरे धीरे बातें करते और पास में आते जाते ,तभी इधर उधर खड़े लड़के पोजीशन में आगये ,और लड़के ने लड़की के गाल पर एक चुम्बन लेलिया ,यह देख मैं ही नहीं आस पास के लोग भी असहज हो गए। एक वृद्ध ने तो झिड़कते हुए बोल दिया की शर्म-लाज तो सब बेच दी है। अगले स्टेशन पर लड़के उतर गए और लड़की महिला रिजर्व डिब्बे की तरफ बढ़ गयी।
नेहरू प्लेस आने वाला था ,मैनें बाहर का नजारा देखा तो लगा सारा शहर राशन की लाइनों में लगा हुआ हो।
दरवाजा खुलते ही ट्रेन के अंदर पल भर में सारी भीड़ घुस गयी ,लग रहा था मानो ये ट्रेन नहीं बल्कि मुर्गियों का बाड़ा हो। अब मुझे भारत की ट्रेन में होने का एहसास जागृत होने लगा था। हर स्टेशन के साथ भीड़ और बढ़ती जा रही थी। मेरा दम बैठकर घुटने लगा था था। ऐसा एहसास हो रहा था जैसे एक मंजिला मकान गगन चुम्बी इमारतों से घिर गया हो। ऊपर से ये भाव आ रहा था मानो हर कोई घूरकर यही बोल रहा है न जाने कब सीट खली करेगा ये।
खान मार्किट आने तक तो मैं उठ गया ,मुझे बड़ा सुकून मिला। C.S ,I.T.O होते हुए ट्रेन जामा मस्जिद रुकी।
जितने लोग अंदर थे उतने ही बाहर ,अब कौन किसमें समायेगा यह तो दरवाजा खुलने पर ही पता लगता। खैर कुछ लोग बाहर निकले तो लेकिन सब लोग अंदर आगये। शायद भीड़ कुछ ज्यादा ही थी इसलिए गार्ड गेट पर व्यवस्था सम्हाल रहे थे।
गेट बंद होने से पहले एक बुजुर्ग दम्पति गेट की तरफ बढ़ रहे थे। एक भरी बैग पति के पास था जिसे ना सम्हाल पाने के कारण वह पीछे रह गए और उनकी पत्नी अंदर आगयीं तभी गेटभी बंद हो गए।
महिला पहले से ही हांफ रही थी ऊपर से ये एक और आफत। वो ट्रेन चलते ही रोने और चिल्लाने लगीं। वह जोर जोर से गेट पीटकर सरदार जी सरदार जी चिल्ला रहीं थी। उन्होंने चेन खींचने को भी कहा ,मगर लोगो ने बताया यहाँ चेन नहीं होती। वो पंजाबी में बोल रहीं थी उन्हें दूसरी भाषा ना तो बोलनी आती थी ना समझनी, वो बेचारी हैरान परेशान बस ट्रेन रोकने के लिए ही कह रही थीं।
मुझसे ये देखा ना गया मैं पास गया पहले पीने का पानी दिया। सबने कहा आप अपने पति को फ़ोन करदो ताकि वो अगले स्टेशन पर आकर आपसे मिल लें। उन्होंने बताया की उनके पास फ़ोन नहीं है। वोटो पहली बार ही दिल्ली आये थे और मेट्रो का तो उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं है।
तभी एक सरदार जी आये और पंजाबी में बातें करने लगे उन्होने उन्हें समझाया की वो अगले स्टेशन पर उतर जाएंगे और गार्ड से कहकर सरदार जी को बुलवा लेंगे। और आप से मिलवा देंगे। यह कहने पर महिला को थोड़ा संतोष हुआ। इतने में पीछे से किसी सामाजिक जीव ने कहा भाई साहब सही कहरहे हो आप साथ उतर जाना और अच्छे से समझकर बिठवा देना। उनकी इस नसीहत को मानते हुए मैं संग होलिया।
लाल किला आ गया था हम उतरे, उस सभ्य व्यक्ति ने मुझसे कहा आप जाएं मैं इन्हे बिठवा दूंगा ,मैं बोला नहीं भाई साहब कोई बात नहीं मैं भी संग ही उतर लिया इतने में एक और सामाजिक जीव ने सही से छोड़ने की नसीहत दे डाली और गेट बंद होने से ठीक पहले अपनी जिम्मेदारी निभाली।
हम तुरंत गार्ड के पास गए और समस्या बतादि ,त्वरित कार्यवाही से पता लगा की सरदार जी वहीँ हैं और अगली मेट्रो से उन्हें निथवा दिया जाएगा और बता दिया जाएगा की उनकी पत्नी अगले स्टेशन पर हैं।
कुछ देर इन्तजार करने के बाद मेट्रो आयी ,उसका गेट खुला और सरदार जी बैग लेकर बाहर निकले। वह महिला उन्हें देखते ही भाग पड़ी और उनके सीने से लगकर रोने लगी। इतनी देर का उनका धैर्य पानी बन अपने पति के साइन लग झर -झर फूट पड़ा ,इस उम्र में बिछड़ना इतना कष्टदायी होता है मुझे पहली बार पता चला।
सच तो यही है पत्नी के लिए पति ही उसका संसार है। और पती ही शक्ति।
हमनें उन्हें बिठाया फिर उनसे पुछा आपको जाना कहाँ है। सरदार जी ने बताया हमें कश्मीरी गेट जाना है वहां से बेटा गाड़ी भेज देगा। जो की हमे घर लेकर जाएगा। हम पहली बार दिल्ली आये हैं ,बेटे से मिलने उसपर समय बहिन था तो उसने बताया मेट्रो से कैसे जाना है। मगर ये सफर इतना कठिन होगा हमे मालूम नहीं था। इन्ही बातों के बीच महिला फिर भावुक होकर बोलने लगी अगर आज इन्हे खो देती तो मेरा क्या होता। अपने को सम्हाल कर फिर हमें धन्यवाद देने लगीं। तभी एक और मेट्रो वहाँ आगयी हमे भी आगे जाना था तो उनके साथ अंदर चल दिए। उनके बेटे को फ़ोन करके सारा वृतांत बताया और खुद माता पिता को लेने आने का अनुरोध किया जिससे आगे सफर में कोई तकलीफ ना हो। उनका लड़का मान गया और खुद आने को राजी हो गया।
कश्मीरी गेट आगया था मुझे आगे जाना था ,और सरदारजी को वही उतरना था तो आगे की जिम्मेदारी उन्ही ने निभा ली।
मैं कश्मीरी गेट उतरा ,मगर ऊपरी तल के चार नंबर प्लेटफॉर्म से रेड लाइन मेट्रो पकड़ कर आगे चल दिया।
तीन स्टेशन बाद शाहदरा आना था थोड़ा ही समय था लेकिन उस वक़्त में मुझे बदलते वक़्त और समाज की जो छवि दिखाई दी वो एक सीख थी मेरे लिए।
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गगन टांकड़ा
(१/२/२०२० )
जितना कुछ मैं बहार देखकर प्रसन्न था उससे ज्यादा अंदर आकर प्रसन्न हो गया। सभी तरफ पूरा उजाला था (एम्बिएंस दिन के हिसाब से सेट था ),पूर्ण वातानुकूलित केबिन की ठंडक ने मेरे पसीनो को पलों में सूखा दिया और मेरे मन को भी शांत किया।
इन सबके बीच मेट्रो अगले स्टॉप पर पहुंच चुकी थी जिसका पता लगा मुझे ऑडियो अनाउंसमेंट से लगा जो की बिलकुल स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी। वरना भारतीय रेल में तो कई बार कान को भी ये पता करना पड़ता है की भला आवाज आयी भी तो कहाँ से।
LED डिस्प्ले हो या ऑटोमैटिक गेट ,पोल हों या खड़े यात्रियों के लिए हैंगर सबकुछ किसी अलग देश में आने का आभास करा रहे थे।
तभी मेरा गौर गया एक हरी पट्टी पर जिसपर लिखा था "महिलाओं के लिए आरक्षित", "विकलांगों के लिए आरक्षित" ,"वृद्धों के लिए आरक्षित " ,"ब्रेल "में लिखे बोर्ड लगे थे ताकि दृष्टि बधिरों को आसानी रहे। यह सब देखकर सुकून मिल रहा था।
कई स्टेशन निकल चुके थे ,सब कुछ सुखद था ,ट्रेन लगभग खाली ही थी मुझे लगा बस ऐसा ही माहौल रहेगा। मैनें बगल वाले यात्री से पूछा क्या ये ट्रेन ऐसे ही खाली रहती है। उसने कोई जवाब नहीं दिया ,मैनें थोड़ा हाथ हिलाया और फिरसे पूछा ,अबके वो हिला और अपने कानों से मोबाईल हैंड फ्री निकाल कर बोला नहीं ,बल्कि थोड़ी देर में इतनी भीड़ हो जाएगी की निकलना है या उतरना पता ही नहीं चलेगा। उसने ऐसा मुझे डराने के लिए बोला या नहीं उसका पता मुझे थोड़ी ही देर में लगने वाला था।
लेकिन उसी वक़्त जो मुझे पता चला वो ये था की लगभग हर युवा ,महिला, प्रौढ़ के हाथ में एक स्मार्ट फ़ोन था जिसमे वो या तो गेम खेल रहे थे या गाने सुन रहे थे ,वीडियो देख रहे थे , कुछ नहीं तो सोशयल मिडिया पर चैट पर लगे हुए थे।
यारी-दोस्ती ,रिश्ते-नाते,चेतना-सम्मान सब नगण्य था वहाँ पर। वहाँ कुछ था तो वो था एक अभूतपूर्व सन्नाटा ,मेट्रो के मोटर की आवाज को तो आराम से सूना जा सकता था। क़दमों की आहात हो या दूर किसी के मोबाइल की घंटी सबकुछ सुना जा सकता था।
इन सब समस्याओं के बीच ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुंची ,कई लोग अंदर आए और अपनी -अपनी राह पकड़ ली ,मगर मैं कुछ लोगों पर चाहकर भी अपनी नजर पड़ने से नहीं रोक पा रहा था। तीन लड़के और एक लड़की ,देखकर लगरहा था शायद किसी शिक्षण संस्थान से आ रहे थे।
बड़े खिलखिलाकर अपने शिक्षक और सहपाठियों की बाते कर रहे थे। मैनें देखा उनमे से एक लड़के ने लड़की के दोनों हाथों को पोल पर जकड़ा हुआ था, और लड़की खिलखिलाकर हंस रही थी।
दोनों धीरे धीरे बातें करते और पास में आते जाते ,तभी इधर उधर खड़े लड़के पोजीशन में आगये ,और लड़के ने लड़की के गाल पर एक चुम्बन लेलिया ,यह देख मैं ही नहीं आस पास के लोग भी असहज हो गए। एक वृद्ध ने तो झिड़कते हुए बोल दिया की शर्म-लाज तो सब बेच दी है। अगले स्टेशन पर लड़के उतर गए और लड़की महिला रिजर्व डिब्बे की तरफ बढ़ गयी।
नेहरू प्लेस आने वाला था ,मैनें बाहर का नजारा देखा तो लगा सारा शहर राशन की लाइनों में लगा हुआ हो।
दरवाजा खुलते ही ट्रेन के अंदर पल भर में सारी भीड़ घुस गयी ,लग रहा था मानो ये ट्रेन नहीं बल्कि मुर्गियों का बाड़ा हो। अब मुझे भारत की ट्रेन में होने का एहसास जागृत होने लगा था। हर स्टेशन के साथ भीड़ और बढ़ती जा रही थी। मेरा दम बैठकर घुटने लगा था था। ऐसा एहसास हो रहा था जैसे एक मंजिला मकान गगन चुम्बी इमारतों से घिर गया हो। ऊपर से ये भाव आ रहा था मानो हर कोई घूरकर यही बोल रहा है न जाने कब सीट खली करेगा ये।
खान मार्किट आने तक तो मैं उठ गया ,मुझे बड़ा सुकून मिला। C.S ,I.T.O होते हुए ट्रेन जामा मस्जिद रुकी।
जितने लोग अंदर थे उतने ही बाहर ,अब कौन किसमें समायेगा यह तो दरवाजा खुलने पर ही पता लगता। खैर कुछ लोग बाहर निकले तो लेकिन सब लोग अंदर आगये। शायद भीड़ कुछ ज्यादा ही थी इसलिए गार्ड गेट पर व्यवस्था सम्हाल रहे थे।
गेट बंद होने से पहले एक बुजुर्ग दम्पति गेट की तरफ बढ़ रहे थे। एक भरी बैग पति के पास था जिसे ना सम्हाल पाने के कारण वह पीछे रह गए और उनकी पत्नी अंदर आगयीं तभी गेटभी बंद हो गए।
महिला पहले से ही हांफ रही थी ऊपर से ये एक और आफत। वो ट्रेन चलते ही रोने और चिल्लाने लगीं। वह जोर जोर से गेट पीटकर सरदार जी सरदार जी चिल्ला रहीं थी। उन्होंने चेन खींचने को भी कहा ,मगर लोगो ने बताया यहाँ चेन नहीं होती। वो पंजाबी में बोल रहीं थी उन्हें दूसरी भाषा ना तो बोलनी आती थी ना समझनी, वो बेचारी हैरान परेशान बस ट्रेन रोकने के लिए ही कह रही थीं।
मुझसे ये देखा ना गया मैं पास गया पहले पीने का पानी दिया। सबने कहा आप अपने पति को फ़ोन करदो ताकि वो अगले स्टेशन पर आकर आपसे मिल लें। उन्होंने बताया की उनके पास फ़ोन नहीं है। वोटो पहली बार ही दिल्ली आये थे और मेट्रो का तो उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं है।
तभी एक सरदार जी आये और पंजाबी में बातें करने लगे उन्होने उन्हें समझाया की वो अगले स्टेशन पर उतर जाएंगे और गार्ड से कहकर सरदार जी को बुलवा लेंगे। और आप से मिलवा देंगे। यह कहने पर महिला को थोड़ा संतोष हुआ। इतने में पीछे से किसी सामाजिक जीव ने कहा भाई साहब सही कहरहे हो आप साथ उतर जाना और अच्छे से समझकर बिठवा देना। उनकी इस नसीहत को मानते हुए मैं संग होलिया।
लाल किला आ गया था हम उतरे, उस सभ्य व्यक्ति ने मुझसे कहा आप जाएं मैं इन्हे बिठवा दूंगा ,मैं बोला नहीं भाई साहब कोई बात नहीं मैं भी संग ही उतर लिया इतने में एक और सामाजिक जीव ने सही से छोड़ने की नसीहत दे डाली और गेट बंद होने से ठीक पहले अपनी जिम्मेदारी निभाली।
हम तुरंत गार्ड के पास गए और समस्या बतादि ,त्वरित कार्यवाही से पता लगा की सरदार जी वहीँ हैं और अगली मेट्रो से उन्हें निथवा दिया जाएगा और बता दिया जाएगा की उनकी पत्नी अगले स्टेशन पर हैं।
कुछ देर इन्तजार करने के बाद मेट्रो आयी ,उसका गेट खुला और सरदार जी बैग लेकर बाहर निकले। वह महिला उन्हें देखते ही भाग पड़ी और उनके सीने से लगकर रोने लगी। इतनी देर का उनका धैर्य पानी बन अपने पति के साइन लग झर -झर फूट पड़ा ,इस उम्र में बिछड़ना इतना कष्टदायी होता है मुझे पहली बार पता चला।
सच तो यही है पत्नी के लिए पति ही उसका संसार है। और पती ही शक्ति।
हमनें उन्हें बिठाया फिर उनसे पुछा आपको जाना कहाँ है। सरदार जी ने बताया हमें कश्मीरी गेट जाना है वहां से बेटा गाड़ी भेज देगा। जो की हमे घर लेकर जाएगा। हम पहली बार दिल्ली आये हैं ,बेटे से मिलने उसपर समय बहिन था तो उसने बताया मेट्रो से कैसे जाना है। मगर ये सफर इतना कठिन होगा हमे मालूम नहीं था। इन्ही बातों के बीच महिला फिर भावुक होकर बोलने लगी अगर आज इन्हे खो देती तो मेरा क्या होता। अपने को सम्हाल कर फिर हमें धन्यवाद देने लगीं। तभी एक और मेट्रो वहाँ आगयी हमे भी आगे जाना था तो उनके साथ अंदर चल दिए। उनके बेटे को फ़ोन करके सारा वृतांत बताया और खुद माता पिता को लेने आने का अनुरोध किया जिससे आगे सफर में कोई तकलीफ ना हो। उनका लड़का मान गया और खुद आने को राजी हो गया।
कश्मीरी गेट आगया था मुझे आगे जाना था ,और सरदारजी को वही उतरना था तो आगे की जिम्मेदारी उन्ही ने निभा ली।
मैं कश्मीरी गेट उतरा ,मगर ऊपरी तल के चार नंबर प्लेटफॉर्म से रेड लाइन मेट्रो पकड़ कर आगे चल दिया।
तीन स्टेशन बाद शाहदरा आना था थोड़ा ही समय था लेकिन उस वक़्त में मुझे बदलते वक़्त और समाज की जो छवि दिखाई दी वो एक सीख थी मेरे लिए।
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गगन टांकड़ा
(१/२/२०२० )
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