एक नया रास्ता एक नयी पहचान
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पश्चिम बंगाल में मुर्शीदाबाद डिस्ट्रिक्ट का रहने वाला दीनू जिसका बचपन मुफलिसी में रेल पटरियों पर बीता ,उसके माँ -बाप भी गरीब थे जो पटरियों पर से कूढा इकट्ठा करते थे। पांच में दीनू दुसरे नंबर का था।
दिनभर जो कूड़ा प्लास्टिक जमा होता उसे शाम को ठेकेदार के यहां बेच आता और घर का गुजर -बसर करता
बस यही जिंदगी थी , दो वक्त का खाना और हरदम किसी न किसी के बीमार रहने के कारण दवाइयों का खर्च।
इनसब के अलावा उसके पास किसी और चीज के लिए पैसे ही नहीं बचते थे।
कपडे फटे हाल और गंदे होते जूतों में चाम से ज्यादा पैर नजर आते थे।
दीनू तीन साल का था तबसे माँ बाप के साथ काम पर जाने लगा था। बड़ा भाई भी संग ही जाता था। और जैसे जैसे दीनू के भाई बहन बढे वैसे वैसे वो उम्र के साथ पारिवारिक कार्यों में लगते गए।
दीनू अब दस साल का था और काफी समझदार हो चूका था दुनियादारी की बाते अब समझ आने लगी थी।
और एक बात तो उसके दिमाग में ऐसी बैठगई थी की उसे कैसे न कैसे ज्यादा पैसा कामना है। और भाई बहनो को आगे पढ़ना है ताकि ये नारकीय जीवन वे आगे ना भुगते।
स्वभावतः कुसंगत में भी पड़ गया था वो ,बिगड़ने की तो उम्र थी जो जैसा समझाता वो उसको समझता , किसी ने बताया की यहाँ से कोलकाता जाने वाली ट्रैन में बहुत आमिर-आमिर लोग सफर करतें हैं ,उनके बैगों में पर्स में पांच पांच सो के नोटों की भीड़ रहती हर, पुरे दिन में एक भी पर्स हाथ लग जाए तो जीवन सफल होजाएगा।
तभी दीनू ने तपाक से कहा यदि ना गिरे तो। तो दुसरे ने कहा यदि गिरा दिया जाए तो ,इतना सुनते ही दिनू ने कहा मतलब की चोरी , नहीं-नहीं में नहीं ,कभी पुलिस ने पकड़ लिया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। न बाबा ना में नहीं करूँगा चोरी।
उन लड़को में जो सबसे बड़ा था , उसने कहा अरे यार तू डर मत सब सेटिंग है यहाँ अपनी तू बस रोज पचास रूपए का इंतजाम करदेना फिर देखना कोण तुझे हाथ लगाता है। और अगर किसी ने पकड़ भी लिया तो मैं छुड़ा लुंगा ,(कुछ पुराने शातिरों की तरफ इशारा करते हुए वो बोला ) देख इन्हे आज अपनी साईकिल है , किराये पर मकान है टैंट में नहीं सोना पड़ता इन्हे ,और रही बात सीखने की तो वो हम सिखादेंगे तुझे।
दीनू ने घबराते हुए संकोच से कहा तो क्या मैं भी दो कमरे
वाले किराये के मकान में रह पाऊंगा। वो बोले हाँ बिलकुल और साईकिल भी खरीद्लेगा।
ये सुनते ही दीनू ने हाँ करदी।
कदाचित बाल मन में गलत विचार डालकर उन्होंने उसका मन गलत दिशा में मोड़ दिया था। समय के साथ वो धीरे धीरे बड़ा होने लगा ,सब चोर मिलकर उसे चोरी के तरीके सीखाने लगे, होशियार था सब जल्दी ही सिख जाता था।
रिजर्वेशन वाले यात्री , खासकर वातानुकूलित वाली बोगियों में लोग सहज होकर बैठते हाँ ,ज्यादतर दीनू वेंडर बनकर इन्ही डिब्बों में चढ़ता और अपने शिकार को तलाशता। रात में जब सब सो जाते तब वह अपने काम को अंजाम देता।और किसी भी स्टेशन पर उतरकर रात के अँधेरे में गायब होजाता।
धीरे धीरे उसकी हिम्मत खुलती चली गई और वो बड़े दांव भी चलने लगा।
एक रात की बात है , दीनू ऐसे ही किसी कोच में चढ़ा ,अपनी वारदात को अंजाम देने के लिए ,उसने देखा एक अधेड़ उम्र का आदमी बड़े सलीके से बैठा है ,उसके पास गहरे लाल रंग का एक छोटा मगर महंगा सूटकेस है,उसमे नंबर वाला लॉक भी लग रहा है,
बस फिर क्या था उसकी नजर उस पर ही टिक गई,क्यूंकि वह एक आसान शिकार था ,और पहले भी ऐसे सूटकेस से उसे अच्छी रकम मिल चुकी थी।
वह टकटकी लगाकर रात का इन्तजार करने लगा।
वह व्यक्ति बार बार उस सूटकेस की तरफ देखता उसपर एक बार हाथ लगाता और संतुष्ट होकर बैठा रहता, यह देखकर दीनू को ुरा यकीं हो गया हो न हो इसमें तो मोटा माल है।
रात हुई धीरे धीरे लोग सोने लगे, लाइटें बंद होने लगीं दीनू के शिकार का समय हो चला था ,उसने एक बार सरसरी निगाह से देखा की सब सोये या नहीं ,खासकर वह व्यक्ति जिसका वो सूटकेस था।
वह सही मोके की तलाश में वहीँ डाटा रहा और जमीन पर चादर डालकर लेट गया (अमूमन ज्यादा आरक्षण के समय ऐसा हो जाता है )
मौका पाकर उसने सीट के निचे से सूटकेस खिसका लिया और कम्बल से ऐसा लपेटा मानलो कम्बल की तय बनाई हो।
इधर उधर देखकर पूर्ण संतुष्ट होने पर की उसे किसी ने देखा नहीं वह उठा तभी ट्रेन की स्पीड भी हलकी होगी और वह एक छोटे से स्टेशन पर रुक गई, मोके का फायदा उठाकर वह डिब्बे से कूद गया और रेलवे स्टेशन से दूर निकल आया। पेड़ के झुरमुट में छुपकर बैठ गया ,फिर उसने उस बैग को उठाया और उसे खोलने के लिए नंबर घूमने लगा , वह सोचरहा था अगर बैग ऐसे ही खुल जाएगा तो उसके भी १०० रूपए आराम से मिल जाएंगे। मगर वह नहीं खुला ,दीनू ने तुरंत अपने औजार निकाले और लॉक तोड़ दिया,सूटकेस खोलने से पहले उसने दोनों हाथ जोड़कर बोलै "अगर इसमें से मोती रकम निकली तो वह उसे अपने छोटे भाई बहन की जिंदगी सुधारने में लगाएगा,और कोशिश करेगा की आगे से चोरी न करनी पड़े"।
तभी पीछे से एक हाथ उसके कंधे पर आया और साथ ही आवाज आई की अगर ऐसा ही करना है तो सूटकेस मत खोलो निराश हो जाओगे।
दीनू के चेहरे पर पकडे जाने के दर के भाव रात के अँधेरे में भी देखे जा सकते थे।
तभी टोर्च की रौशनी में वही अधेड़ उम्र का आदमी सामने आया और फिरसे दोहराया "यदि तुम यह सब छोड़ना चाहते हो तो इस सूटकेस को बिलकुल मत खोलना , निराश होजाओगे और फिरसे चोरी करने लगोगे।
पकडे जाने के असमंजस में दीनू सकपकाहट में बोला " चोरी मैनें-मैनें यह नहीं चुराया, नहीं-नहीं मैनें कुछ नहीं किया ,हाँ मैं तो यहाँ सो रहा था, कोई यहाँ बैग पटक गया जिससे मेरी नींद खुल गई और मेने बैग खोलने की कोशिश करी। "
वह आदमी बोला चुप करो मैं तुम्हे ट्रेन में से देख रहा हूँ। सब देखा है मैनें।
तभी दीनू को लगा यहाँ से भाग जाना ही ठीक है। उसने उस अधेड़ को धक्का देकर भाग जाना ही ठीक समझा ,उसने जैसे ही दौड़ने के लिए कदम आगे बढ़ाया उसका पैर पत्थर पर टकरा गया और वह गिर गया ,
गिरते ही दीनू दर्द से चिल्ला दिया उस व्यक्ति ने कहा अर भाई चोट तो नहीं लगी। चलो उठो और और हाथ बढ़कर बोलै डरो मत में कुछ नहीं करने वाला और ज़रा मेरी उम्र तो देखो।
दीनू असहज सा उठकर बेथ गया ,और पूछा क्या इस अटैची में कुछ कीमती है जो आप मेरे पीछे पीछे आगये।
उस व्यक्ति ने हाँ में उत्तर दिया।
दीनू फिर बोलै तो आपने मुझे इसे खोलकर देखने को क्यूँ मना करा।
उन्होंने जवाब दिया मैं GRP में सिपाही हूँ ,बर्धमान से रिटायर हुआ हूँ दो साल पहले। इस सूटकेस में मेरे सारे जरुरी कागज हैं। जिनका तुम कुछ नहीं करसकते मगर ये मेरे लिए मूलयवान हैं।
दीनू बोला इसका मतलब आप पुलिस वाले हो और अब आप मुझको पकड़वाओगे।
वो बोले नहीं-नहीं मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला ,बल्कि मैनें तो तुम्हे कोलकाता स्टेशन पर चढ़ते समय ही देख कर समझ लिया था की तुम एक चोर हो। चाहता तो वहीँ पकड़वा देता। मगर जब तुमने बार बार मेरे आस पास चक्कर काटना शुरू किया तभी मैं समझ गया था तुम मेरे सूटकेस के चक्कर में हो और मैं बार बार तुम्हे ऐसे इशारे दे रहा था जिससे तुम्हे यकीं होजाए की इस सूटकेस में कुछतो है।
जब तुमने मुझे अपना शिकार बनाने का सोचा मेने तभी सोच लिया था की तुम ही मेरे उद्देश्य को पूरा करोगे।
दीनू को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो चौंककर बोला उद्देश्य कैसा उद्देश्य,और भला मैं क्या करसकता हूँ।
(उस व्यक्ति ने दीनू को बैठने के लिए कहा और पूरा वृतांत सुनने को कहा,दीनू ने वैसा ही किया। )
वह बोला___आठ साल पहले जब मैं कोलकाता स्टेशन पोस्ट होकर आया तब,मुझे वहाँ के सभी लफंगों और भिखारियों की पहचान करवा दी गयी। या नया इंचार्ज आते ही वो खुद मिलने आने लगे।
वो सब मिलकर मुझे १०० रूपए रोज देते थे ताकि मैं उन्हें ना पकड़ूं ,उनसबमे एक १४-१५ साल का लड़का भी था जो स्टेशन पर प्लास्टिक की बोतलें बीनता था, उसका नाम विश्वजीत था। बहुत ही फुर्तीला ,होशियार था वो दिल का एकदम नेक जब मिलता मुस्कुराहट छाई रहती थी ,बिना कहे पानी भरदेना अखबार देजाना और कभी कभी एक सिगरेट भी लादेता था, मै पैसा देने को होता तो बस अपनी कृपा बनाने की कहता। उससे कोई काम कहो तो हंसकर तेजी से निपटा देता।
बोलता था साहब जब बड़ा आदमी बन जाऊंगा तो माँ को घर घर काम नहीं करने दूंगा। अकेला लड़का था वो पिता भी नहीं था उसका।
उससे मैं बड़ा खुश रहता था। उसके लिए कुछ करने की सोचता था ,मगर नौकरी और परिवार की सोचकर शांत होजाता। मैनें सोच रखा था जैसे ही मेरे बच्चे नौकरी से लगेंगे और में रिटायर होऊंगा तो इसे अपने साथ ही रख लूंगा। लेकिन चार साल पहले वो चल बसा।
दीनू ( चौंककर)क्या वो चल बसा वैसे मुझे इनसबसे क्या मतलब।
उस व्यक्ति ने कहा मैं तुम्हे बताता हूँ।
असल में उसके प्रति मेरा लगाव बन गया था ये बात मैं उसको नहीं बताता था।
वह ज्यादातर लोकल में जाता था बोतलें प्लास्टिक बीनता था ,उसके ग्रुप वाले सब उससे परेशान थे,वो ज्यादा कमाई करके नहीं ला पता था। लेकिन वो एक काम करता था चोरो के लिए मुखबिरी, जिसकी वजह से सब उसे रखते थे।
एक बार वो साथियों के साथ किसी लम्बी दूरी की ट्रेन में बैठ गया था। चलती ट्रेन में उसके साथियों ने छोटी-मोटी वारदात को अंजाम दिया था। ट्रेन कहीं रुकी तो वहां उतारकर बंटवारा करने लगे ,वहां के चोरों की टोली ने उन्हें देख लिया ,और जबरन अपना हिस्सा उनसे मांगने लगे , इसी बात को लेकर उनके बिच हाथापाई होगयी ,किसी ने ब्लेड निकलकर "विश्वजीत"पर हमला करदिया और भाग गए।
वो खून से लथपथ था. उसके साथियों ने उसके घाव पोंछ दिए और पट्टी बांध कर घर ले आए।
मुझे वो सब लोग नियम से आते दीखते मगर "विश्वजीत"नहीं आता था। मैनें सोचा शायद दर्द की वजह से ना आता हो। चार पांच दिन बाद मेने पूछा तो पता चला की वो मर गया।
ब्लेड के घाव ने उसके शरीर में अंदर ही अंदर जहर फैला दिया था ,सही इलाज और साफ़ सफाई ना होने से एक हँसता खिलखिलाता लड़का दुनिया से चला गया।
उसकी मौत ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था ,मेरी अंतरात्मा मुझे कोस रही थी, मुझे ऐसा महसूस हो रहा था की शायद मैं भी इस सब का एक कारन हूँ।
बस तभी से मैनें प्रण लेलिया था की आजतक जो भी मैनें कमाया है वो सब मैं ऐसे लोगों के उत्थान में लगादूंगा जो जीवन में परेशानियों के बिच कुछ बनाना चाहते हैं ,कुछ करना चाहते हैं। वो लोग जो अपने जीवन को इन
बुराइयों से बाहर निकालकर परिवार समाज क लिए कुछ करना चाहते हैं वह सब मेरे उद्देश्य में सहायक हैं।
बस तभी से में तुम जैसों की तलाश में रहता हूँ जो मजबूरी या षड्यंत्र के तहत गलत कामों में डाल दिए जाते हैं।
बच्चे अगर तुम भी अपनी जिंदगी को बदलना चाहते होतो मेरे साथ चलो ,मैं एक संस्था चलाता हूँ जो तुम जैसे लोगों को काम देती है।
ठीक-ठाक पैसे मिल जाते हैं और इज्जत भी, और साथ ही तुम अपने परिवार का ध्यान भी रखसकते हो।
यह सुनकर दीनू सन्न रह गया और बोला क्या वहां पर काम करके मैं और मेरे छोटे भाई बहिन अच्छे से रह सकेंगे।
उस व्यक्ति ने दीनू का उत्तर हाँ में दिया।
दीनू ने हाथ जोड़े और नाम आँखों से उस व्यक्ति का धन्यवाद किया ,उस व्यक्ति ने बड़ी ही कृतग्यता और अपनेपन से उसे उठाया और अपने गले लगा लिया ,और कहा।
शुक्रिया मेरा नहीं
"शुक्रिया है उस ईश्वर का जिसने तुम्हे और मुझे फिरसे एक मौका दिया "
दोनों बैग उठाकर अँधेरे में अपनी मंजिल की ओर चल देते हैं।
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गगन टांकड़ा
२०१६
बस यही जिंदगी थी , दो वक्त का खाना और हरदम किसी न किसी के बीमार रहने के कारण दवाइयों का खर्च।
इनसब के अलावा उसके पास किसी और चीज के लिए पैसे ही नहीं बचते थे।
कपडे फटे हाल और गंदे होते जूतों में चाम से ज्यादा पैर नजर आते थे।
दीनू तीन साल का था तबसे माँ बाप के साथ काम पर जाने लगा था। बड़ा भाई भी संग ही जाता था। और जैसे जैसे दीनू के भाई बहन बढे वैसे वैसे वो उम्र के साथ पारिवारिक कार्यों में लगते गए।
दीनू अब दस साल का था और काफी समझदार हो चूका था दुनियादारी की बाते अब समझ आने लगी थी।
और एक बात तो उसके दिमाग में ऐसी बैठगई थी की उसे कैसे न कैसे ज्यादा पैसा कामना है। और भाई बहनो को आगे पढ़ना है ताकि ये नारकीय जीवन वे आगे ना भुगते।
स्वभावतः कुसंगत में भी पड़ गया था वो ,बिगड़ने की तो उम्र थी जो जैसा समझाता वो उसको समझता , किसी ने बताया की यहाँ से कोलकाता जाने वाली ट्रैन में बहुत आमिर-आमिर लोग सफर करतें हैं ,उनके बैगों में पर्स में पांच पांच सो के नोटों की भीड़ रहती हर, पुरे दिन में एक भी पर्स हाथ लग जाए तो जीवन सफल होजाएगा।
तभी दीनू ने तपाक से कहा यदि ना गिरे तो। तो दुसरे ने कहा यदि गिरा दिया जाए तो ,इतना सुनते ही दिनू ने कहा मतलब की चोरी , नहीं-नहीं में नहीं ,कभी पुलिस ने पकड़ लिया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। न बाबा ना में नहीं करूँगा चोरी।
उन लड़को में जो सबसे बड़ा था , उसने कहा अरे यार तू डर मत सब सेटिंग है यहाँ अपनी तू बस रोज पचास रूपए का इंतजाम करदेना फिर देखना कोण तुझे हाथ लगाता है। और अगर किसी ने पकड़ भी लिया तो मैं छुड़ा लुंगा ,(कुछ पुराने शातिरों की तरफ इशारा करते हुए वो बोला ) देख इन्हे आज अपनी साईकिल है , किराये पर मकान है टैंट में नहीं सोना पड़ता इन्हे ,और रही बात सीखने की तो वो हम सिखादेंगे तुझे।
दीनू ने घबराते हुए संकोच से कहा तो क्या मैं भी दो कमरे
वाले किराये के मकान में रह पाऊंगा। वो बोले हाँ बिलकुल और साईकिल भी खरीद्लेगा।
ये सुनते ही दीनू ने हाँ करदी।
कदाचित बाल मन में गलत विचार डालकर उन्होंने उसका मन गलत दिशा में मोड़ दिया था। समय के साथ वो धीरे धीरे बड़ा होने लगा ,सब चोर मिलकर उसे चोरी के तरीके सीखाने लगे, होशियार था सब जल्दी ही सिख जाता था।
रिजर्वेशन वाले यात्री , खासकर वातानुकूलित वाली बोगियों में लोग सहज होकर बैठते हाँ ,ज्यादतर दीनू वेंडर बनकर इन्ही डिब्बों में चढ़ता और अपने शिकार को तलाशता। रात में जब सब सो जाते तब वह अपने काम को अंजाम देता।और किसी भी स्टेशन पर उतरकर रात के अँधेरे में गायब होजाता।
धीरे धीरे उसकी हिम्मत खुलती चली गई और वो बड़े दांव भी चलने लगा।
एक रात की बात है , दीनू ऐसे ही किसी कोच में चढ़ा ,अपनी वारदात को अंजाम देने के लिए ,उसने देखा एक अधेड़ उम्र का आदमी बड़े सलीके से बैठा है ,उसके पास गहरे लाल रंग का एक छोटा मगर महंगा सूटकेस है,उसमे नंबर वाला लॉक भी लग रहा है,
बस फिर क्या था उसकी नजर उस पर ही टिक गई,क्यूंकि वह एक आसान शिकार था ,और पहले भी ऐसे सूटकेस से उसे अच्छी रकम मिल चुकी थी।
वह टकटकी लगाकर रात का इन्तजार करने लगा।
वह व्यक्ति बार बार उस सूटकेस की तरफ देखता उसपर एक बार हाथ लगाता और संतुष्ट होकर बैठा रहता, यह देखकर दीनू को ुरा यकीं हो गया हो न हो इसमें तो मोटा माल है।
रात हुई धीरे धीरे लोग सोने लगे, लाइटें बंद होने लगीं दीनू के शिकार का समय हो चला था ,उसने एक बार सरसरी निगाह से देखा की सब सोये या नहीं ,खासकर वह व्यक्ति जिसका वो सूटकेस था।
वह सही मोके की तलाश में वहीँ डाटा रहा और जमीन पर चादर डालकर लेट गया (अमूमन ज्यादा आरक्षण के समय ऐसा हो जाता है )
मौका पाकर उसने सीट के निचे से सूटकेस खिसका लिया और कम्बल से ऐसा लपेटा मानलो कम्बल की तय बनाई हो।
इधर उधर देखकर पूर्ण संतुष्ट होने पर की उसे किसी ने देखा नहीं वह उठा तभी ट्रेन की स्पीड भी हलकी होगी और वह एक छोटे से स्टेशन पर रुक गई, मोके का फायदा उठाकर वह डिब्बे से कूद गया और रेलवे स्टेशन से दूर निकल आया। पेड़ के झुरमुट में छुपकर बैठ गया ,फिर उसने उस बैग को उठाया और उसे खोलने के लिए नंबर घूमने लगा , वह सोचरहा था अगर बैग ऐसे ही खुल जाएगा तो उसके भी १०० रूपए आराम से मिल जाएंगे। मगर वह नहीं खुला ,दीनू ने तुरंत अपने औजार निकाले और लॉक तोड़ दिया,सूटकेस खोलने से पहले उसने दोनों हाथ जोड़कर बोलै "अगर इसमें से मोती रकम निकली तो वह उसे अपने छोटे भाई बहन की जिंदगी सुधारने में लगाएगा,और कोशिश करेगा की आगे से चोरी न करनी पड़े"।
तभी पीछे से एक हाथ उसके कंधे पर आया और साथ ही आवाज आई की अगर ऐसा ही करना है तो सूटकेस मत खोलो निराश हो जाओगे।
दीनू के चेहरे पर पकडे जाने के दर के भाव रात के अँधेरे में भी देखे जा सकते थे।
तभी टोर्च की रौशनी में वही अधेड़ उम्र का आदमी सामने आया और फिरसे दोहराया "यदि तुम यह सब छोड़ना चाहते हो तो इस सूटकेस को बिलकुल मत खोलना , निराश होजाओगे और फिरसे चोरी करने लगोगे।
पकडे जाने के असमंजस में दीनू सकपकाहट में बोला " चोरी मैनें-मैनें यह नहीं चुराया, नहीं-नहीं मैनें कुछ नहीं किया ,हाँ मैं तो यहाँ सो रहा था, कोई यहाँ बैग पटक गया जिससे मेरी नींद खुल गई और मेने बैग खोलने की कोशिश करी। "
वह आदमी बोला चुप करो मैं तुम्हे ट्रेन में से देख रहा हूँ। सब देखा है मैनें।
तभी दीनू को लगा यहाँ से भाग जाना ही ठीक है। उसने उस अधेड़ को धक्का देकर भाग जाना ही ठीक समझा ,उसने जैसे ही दौड़ने के लिए कदम आगे बढ़ाया उसका पैर पत्थर पर टकरा गया और वह गिर गया ,
गिरते ही दीनू दर्द से चिल्ला दिया उस व्यक्ति ने कहा अर भाई चोट तो नहीं लगी। चलो उठो और और हाथ बढ़कर बोलै डरो मत में कुछ नहीं करने वाला और ज़रा मेरी उम्र तो देखो।
दीनू असहज सा उठकर बेथ गया ,और पूछा क्या इस अटैची में कुछ कीमती है जो आप मेरे पीछे पीछे आगये।
उस व्यक्ति ने हाँ में उत्तर दिया।
दीनू फिर बोलै तो आपने मुझे इसे खोलकर देखने को क्यूँ मना करा।
उन्होंने जवाब दिया मैं GRP में सिपाही हूँ ,बर्धमान से रिटायर हुआ हूँ दो साल पहले। इस सूटकेस में मेरे सारे जरुरी कागज हैं। जिनका तुम कुछ नहीं करसकते मगर ये मेरे लिए मूलयवान हैं।
दीनू बोला इसका मतलब आप पुलिस वाले हो और अब आप मुझको पकड़वाओगे।
वो बोले नहीं-नहीं मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला ,बल्कि मैनें तो तुम्हे कोलकाता स्टेशन पर चढ़ते समय ही देख कर समझ लिया था की तुम एक चोर हो। चाहता तो वहीँ पकड़वा देता। मगर जब तुमने बार बार मेरे आस पास चक्कर काटना शुरू किया तभी मैं समझ गया था तुम मेरे सूटकेस के चक्कर में हो और मैं बार बार तुम्हे ऐसे इशारे दे रहा था जिससे तुम्हे यकीं होजाए की इस सूटकेस में कुछतो है।
जब तुमने मुझे अपना शिकार बनाने का सोचा मेने तभी सोच लिया था की तुम ही मेरे उद्देश्य को पूरा करोगे।
दीनू को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो चौंककर बोला उद्देश्य कैसा उद्देश्य,और भला मैं क्या करसकता हूँ।
(उस व्यक्ति ने दीनू को बैठने के लिए कहा और पूरा वृतांत सुनने को कहा,दीनू ने वैसा ही किया। )
वह बोला___आठ साल पहले जब मैं कोलकाता स्टेशन पोस्ट होकर आया तब,मुझे वहाँ के सभी लफंगों और भिखारियों की पहचान करवा दी गयी। या नया इंचार्ज आते ही वो खुद मिलने आने लगे।
वो सब मिलकर मुझे १०० रूपए रोज देते थे ताकि मैं उन्हें ना पकड़ूं ,उनसबमे एक १४-१५ साल का लड़का भी था जो स्टेशन पर प्लास्टिक की बोतलें बीनता था, उसका नाम विश्वजीत था। बहुत ही फुर्तीला ,होशियार था वो दिल का एकदम नेक जब मिलता मुस्कुराहट छाई रहती थी ,बिना कहे पानी भरदेना अखबार देजाना और कभी कभी एक सिगरेट भी लादेता था, मै पैसा देने को होता तो बस अपनी कृपा बनाने की कहता। उससे कोई काम कहो तो हंसकर तेजी से निपटा देता।
बोलता था साहब जब बड़ा आदमी बन जाऊंगा तो माँ को घर घर काम नहीं करने दूंगा। अकेला लड़का था वो पिता भी नहीं था उसका।
उससे मैं बड़ा खुश रहता था। उसके लिए कुछ करने की सोचता था ,मगर नौकरी और परिवार की सोचकर शांत होजाता। मैनें सोच रखा था जैसे ही मेरे बच्चे नौकरी से लगेंगे और में रिटायर होऊंगा तो इसे अपने साथ ही रख लूंगा। लेकिन चार साल पहले वो चल बसा।
दीनू ( चौंककर)क्या वो चल बसा वैसे मुझे इनसबसे क्या मतलब।
उस व्यक्ति ने कहा मैं तुम्हे बताता हूँ।
असल में उसके प्रति मेरा लगाव बन गया था ये बात मैं उसको नहीं बताता था।
वह ज्यादातर लोकल में जाता था बोतलें प्लास्टिक बीनता था ,उसके ग्रुप वाले सब उससे परेशान थे,वो ज्यादा कमाई करके नहीं ला पता था। लेकिन वो एक काम करता था चोरो के लिए मुखबिरी, जिसकी वजह से सब उसे रखते थे।
एक बार वो साथियों के साथ किसी लम्बी दूरी की ट्रेन में बैठ गया था। चलती ट्रेन में उसके साथियों ने छोटी-मोटी वारदात को अंजाम दिया था। ट्रेन कहीं रुकी तो वहां उतारकर बंटवारा करने लगे ,वहां के चोरों की टोली ने उन्हें देख लिया ,और जबरन अपना हिस्सा उनसे मांगने लगे , इसी बात को लेकर उनके बिच हाथापाई होगयी ,किसी ने ब्लेड निकलकर "विश्वजीत"पर हमला करदिया और भाग गए।
वो खून से लथपथ था. उसके साथियों ने उसके घाव पोंछ दिए और पट्टी बांध कर घर ले आए।
मुझे वो सब लोग नियम से आते दीखते मगर "विश्वजीत"नहीं आता था। मैनें सोचा शायद दर्द की वजह से ना आता हो। चार पांच दिन बाद मेने पूछा तो पता चला की वो मर गया।
ब्लेड के घाव ने उसके शरीर में अंदर ही अंदर जहर फैला दिया था ,सही इलाज और साफ़ सफाई ना होने से एक हँसता खिलखिलाता लड़का दुनिया से चला गया।
उसकी मौत ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था ,मेरी अंतरात्मा मुझे कोस रही थी, मुझे ऐसा महसूस हो रहा था की शायद मैं भी इस सब का एक कारन हूँ।
बस तभी से मैनें प्रण लेलिया था की आजतक जो भी मैनें कमाया है वो सब मैं ऐसे लोगों के उत्थान में लगादूंगा जो जीवन में परेशानियों के बिच कुछ बनाना चाहते हैं ,कुछ करना चाहते हैं। वो लोग जो अपने जीवन को इन
बुराइयों से बाहर निकालकर परिवार समाज क लिए कुछ करना चाहते हैं वह सब मेरे उद्देश्य में सहायक हैं।
बस तभी से में तुम जैसों की तलाश में रहता हूँ जो मजबूरी या षड्यंत्र के तहत गलत कामों में डाल दिए जाते हैं।
बच्चे अगर तुम भी अपनी जिंदगी को बदलना चाहते होतो मेरे साथ चलो ,मैं एक संस्था चलाता हूँ जो तुम जैसे लोगों को काम देती है।
ठीक-ठाक पैसे मिल जाते हैं और इज्जत भी, और साथ ही तुम अपने परिवार का ध्यान भी रखसकते हो।
यह सुनकर दीनू सन्न रह गया और बोला क्या वहां पर काम करके मैं और मेरे छोटे भाई बहिन अच्छे से रह सकेंगे।
उस व्यक्ति ने दीनू का उत्तर हाँ में दिया।
दीनू ने हाथ जोड़े और नाम आँखों से उस व्यक्ति का धन्यवाद किया ,उस व्यक्ति ने बड़ी ही कृतग्यता और अपनेपन से उसे उठाया और अपने गले लगा लिया ,और कहा।
शुक्रिया मेरा नहीं
"शुक्रिया है उस ईश्वर का जिसने तुम्हे और मुझे फिरसे एक मौका दिया "
दोनों बैग उठाकर अँधेरे में अपनी मंजिल की ओर चल देते हैं।
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गगन टांकड़ा
२०१६
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