audio

C:\Users\VISHAL\Documents\Sound recordings

Thursday, March 5, 2020

some story behind indian railway

      -:मेरी प्रथम रेल यात्रा :-
==============




 मैं गगन:
वैसे तो मैं अट्ठाइस साल का हूँ , मगर मैनें  कभी पूर्व में भारतीय रेल का अनुभव नहीं किया है क्यूंकि फरीदाबाद में रहता हूँ आने जाने के लिए निजी वाहन का ही प्रयोग करता हूँ।  
                      आज मैं पहली बार ट्रेन से सफर कर रहा था, मैं और कुछ दोस्त गोवा घूमने जा रहे थे पांच दिन के ट्रिप पर। 
सामान पैक था कार हमें निजामुद्दीन स्टेशन लेकर पहुंची,मेरा पहला अनुभव कुछ अच्छा नहीं रहा , भीड़ देखकर मैं डर गया बैग सीढ़ियों पर चढ़ते समय आगे पीछे दोनों तरफ टकरा रहे थे ,जिसकी वजह से बैलेंस नहीं बन रहा था,
एकाएक भीड़ का एक रेला आगे से आया मैं  गिरने ही वाला था फिर सम्हल गया , गुस्सा तो इतना आया कि जिसने धक्का दिया उसे पीट दूँ मगर वहाँ कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। 
ब्रिज पर चढ़कर ही राहत मिली, मैनें देखा एक ट्रेन आई उसमे से बहुत सारे लोग उतरे और चढ़े ,मैनें अपने दोस्त से पूछा क्या इस तरह से ही हमें भी जाना होगा । 
उसने बताया नहीं यह तो लोकल ट्रेन हे सस्ती टिकिट होती है रोज वाले यात्री इसी से सफर करते हैं। 
हमतो एक्सप्रेस से जाएंगे जो पर्याप्त देर तक रुकेगी और हमारी सीट पहले ही बुक है ,तो डरने की भी जरुरत भी नहीं, मेने प्रतिउत्तर में बस ठीक है का सम्बोधन दिया। 
                       पहली बार था तो सब बड़ा अजीब लग रहा था , जब पूछताछ की खिड़की पर गए तो ऐसा लगा मानलो किसी बड़े सुपरस्टार की फिल्म रिलीज हुई हो। 

बहरहाल मेरे दोस्त ने बताया अभी समय है, करीब आधा घंटा ट्रेन यहीं से बनकर चलेगी, हम निर्धारित प्लेटफार्म पर पहुंचे , वहाँ पहुंचकर मैनें ऐसी चीज देखी जिसे मैनें बचपन में किसी पार्क में लगा हुआ देखा था ,वो चीज थी वजन तोलने की मशीन ,उसे देखते ही मैं उसपर चढ़ गया सिक्का डाला और मशीन  ने जो टिकिट बाहर निकाला उसे देख सबकी हँसी ही छूट गई।
 मेरा वजन आया दस किलो हम सब ठहाके लगाने लगे, मेरा एक मित्र बोला ये अब खराब हैं कोई रिपेयर ही नहीं करता इन्हे। 

हम बस वहीँ खड़े थे। मैनें देखा एक औरत प्लेटफॉर्म के बिलकुल किनारे पर बैठी थी मेरे मन में उत्सुकता थी न जाने वो वहां क्यों बैठी है, थोड़ी देर में ही मुझे समझ आगया  की वो अपना प्रसाधन कार्य समाप्त करके चली गई है। 
लोग कहीं भी बैठे थे इधर-उधर थूक रहे थे वहीँ बैठकर खा रहे थे , कुछ पिन्नियो के तिरपाल पर सो रहे थे। बस वहाँ जो कुछ हो रहा था या दिख रहा था वो सब अटपटा लग रहा था।  
                                               एक ट्रेन निकली तो हमे  भी कुर्सियों पर बैठने को जगह मिल गयी, कुछ देर बाद वहां एक सात आठ साल का बच्चा  आया और मुझसे भीक मांगने लगा मैनें तरस खाकर उसे दस रुपए देदीए,मेरे दोस्त नें तपाक से मुझसे कहा अरे ये क्या करदिया उसे पैसे क्यों दिए अब देखना मजा ,तब तो मैं समझ नहीं पाया मगर जब हर दो मिनिट में भीख मांगने वाले आने लगे तो बात समझ में आगयी। यहाँ तक कि कुछ तो दूसरा और तीसरा दौरा भी कर गए ,
बहरहाल मैनें घडी की तरफ देखा थोड़ा ही समय शेष था ट्रेन आने में ,मैनें सोचा जल्दी इन सबसे पीछा छूटेगा। 

तभी सूचना हुई ट्रेन को अभी आधा घंटा और लगेगा यहाँ आने में। उस आधे घंटे का पौना और पौने का एक घंटा हो गया और मुझे ऐसा लगने लगा मनो यहाँ बैठे सदियां बीत गयीं हो। 

 मैं कुछ मन की उधेड़ बुन में था तभी मेरे दोस्त बैग लेकर भागने लगे और मुझसे भी भागने को कहा। 
पता चला ट्रैन तो किसी दुसरे प्लेटफार्म पर खड़ी है ,मैराथन की तरह दौड़ लगाकर जैसे तैसे वहाँ तक पहुंचे ही थे की ट्रैन चल पड़ी। 
हमारा कोच बस दो डिब्बे आगे ही था मैनें मुड़कर देखा मेरा कोई दोस्त वहाँ  नहीं था मैं कुछ समझ पाता उससे पहले एक मित्र की दोस्ती वाले सम्बोधन (आप समझ गए होंगे) में आवाज आई , गगन कही भी चढ़ जाओ अंदर सब एक हैं। मैनें भी गेट को पकड़ा और चढ़कर राहत की सांस ली फिर आगे चलकर अपनी तय सीट तक पहुंचे ,ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ा ही होगा की ट्रेन यकायक रुक गयी ,किसी ने चेन पुल् करदी थी तब पता चला ट्रेन को भी एमरजेंसी में रोका जा सकता है। उस समय  गुस्सा तो बहुत आया क्या ये पहले नहीं रुक सकती थी बेवजह ही भगवा दिया। 
 पर कर भी क्या सकते थे। 
       हमारी सीट पर पहले से ही कुछ लोग बैठे थे ,हमने पूछा तो बड़े प्रेम से बोले बस थोड़ी देर की ही बात है मथुरा उतरना है फिर आप आराम से बैठना हमने भी सामंजस्य बैठा लिया। 
        थोड़ी दूर ही चले होंगे की जोर जोर से तालियां पीटने की आवाज आने लगी। मैनें सोचा यहाँ इनका क्या काम शायद यात्रा कर रहे होंगे,पर नहीं वोटो यहां भी पैसे ही मांग रहीं थी,और हम लड़कों के ग्रुप को देखकर तो मजाक करने लगीं। 
मैनें ऐसे ही पूछ लिया टिकिट लेकर चले हो या फिर ऐसे ही ,अपनी चिर-परिचित हरकतें करके बताया की G.R.P  वालों को खिलाना पड़ता तब चढ़ते हैं ट्रेन में आ पाते हैं , और हम सबसे ५० रूपए झटक कर चलते बने। 

हिचकोले खाती ट्रेन का अलग ही मजा आ रहा था , पहली बार था इसलिए सजा में भी मजा आ रहा था। 
दोस्ती यारी में समय कब कट गया पता ही नहीं चला अब रात होने को थी नीद आने लगी थी ,हम सब अपनी सीट बिछा बिछा कर लेट गए। 
मै  ऊपर वाली सीट पर था और नींद के आगोश ने मुझे अपने अंदर समेटा ही था कि  एक गुस्ताख़ चाय वाले ने मेरे कान के पास आकर इतना जोर से चाय-चाय चिल्लाया कि मुझे समझ आगया कि यहां सिरहाना कहाँ है। 
मुझे कुछ देर में ही गहरी नींद आगयी शायद पालने में ही ऐसी नींद आयी होगी।  

जब कोई स्टेशन आता और ट्रैन स्लो होती तब कई बार स्टेशन का नाम पढ़ने की कोशिश की। पर भारतीय रेल के एक और चमत्कार से साक्छात्कार हुआ , स्टेशन का नाम उस दिशा में लग रहा था जहां यात्री चाहकर भी उसे न पढ़ सके ,ऊपर से कहीं लाइट नहीं जो पता लगे की कोई छोटा स्टेशन आया है  या जंगल। पूरी रात बस ऐसे ही कट गयी। 
सुबह उठे फ्रेश होने गए फिर आकर गप्पे हांकने लगे और नाश्ता करने लगे। ताजे फल वाले, पोहा वाले और इडली वाले आने शुरू हो गए। 
 जैसे जैसे दिन चढ़ने लगा हर कोई प्रसाधन जाने लगा भीड़ बढ़ती जा रही थी और भीड़ के साथ दुर्गन्ध भी। 
                                                       इस बिच ट्रेन कई घुमाव और नयी जगहों से निकली जंगल नदियों के पुल , रेल टनल और कई मनमोहक दृश्य  भी दिखे जो आँखों क लिए नए भी थे और उत्साह जनक भी। 
जैसे जैसे दूरी घट रही थी वैसे वैसे मन में उत्साह भी पनप रहा था। 
हम उतर कर क्या करने वाले हैं इसका भी प्लान बनने लगा। 

समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला और ट्रेन अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गयी ,हम सब भी उतर गए 
मैनें बाहर उतरकर एक फोटो खिचवाया और आगे बढ़ गया ,
हमने चार दिन मौज मस्ती की एक बार भी उसमे ट्रेन के सफर का जिक्र नहीं था।  हमने बस मौज की। 
                                           लौटना हमारा फ़्लाइट  से तय था तो मुम्बाई आकर प्लेन में  बैठ गए। 
और किसी का तो पता नहीं पर मैनें वहां बैठकर उन सभी दिनों की याद दोहराई और जिस बात पर मुझे सबसे ज्यादा  मुस्कान आई वो थी भारतीय रेल में गुजारे वो पल।

'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
गगन टांकड़ा  

No comments:

Post a Comment