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Thursday, April 30, 2020

बापू तू क्यूँ रोता है



बापू तू क्यूँ रोता है
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लेखक ने लिखना शुरू ही किया था ,वह शांति सौहार्द पर एक छोटी सी टिप्पड़ी लिखना चाहता था। पर धीरे धीरे उसके कानो में वही रखे  रेडियो की आवाज गूंजने लगी। कहीं पर लाठी चार्ज हुआ ,नेताओं ने एक दूसरे पर कीचड़ उछाला ,कई लोग हताहत हुए ,किसी ने दमन बताकर आत्मदाह की कोशिश की , कई घर उजड़ गए ,सरकार द्वारा दिए गए रहत कोष को नेता चर गए ,दंगो में मरने वालों के परिवार को जाती के आधार पर रकम मिली जिसका फायदा दूसरों ने उठाया।  इन सब पर कमेटिया बैठ गयी सैलून  कमेटियों ने जवाब नहीं दिया जिससे फैसला सालो तक  लंबित हो गया। जिससे कमेंटियों में बैठे लोगों की कोठियों के निर्माण कार्य भी आगे बढ़ गए। कमेटियों की कार्यप्रणाली देखने के लिए उनपर बैठी पर कुछ ना हुआ। फिर सरकार बदली और उन कमेंटियों द्वारा किये गए घपलों की जानकारी देने के लिए कमेटि बैठी पर कुछ न हुआ। पुराने नेताओं  ऊपर भी जांच कमैटी बैठी जो जनता का पैसा दीपावली की मिठाई समझ कर खा गए और मेंवो को विदेश में जमा करा आये। . 
नयी सरकार आयी और उसने भी वही कहा देश आर्थिक प्रगति पर है। फिर भी महंगाई आसमान पर है। 
सहसा लेखक का हाथ रुक गया सब व्यर्थ है। वह सोचने लगा आखिर इस सबके पीछे हम खुद जिम्मेदार हैं। 
न हम सर्कार चुनकर हाथ पर हाथ रखकर बैठते और ना ही वह यह सब कर पाते। अगर आजादी के समय के नेता जमीनों को बेच कहते तो "जय जवान जय किसान" बोलने की कभी हिम्मत ना कर पाते। अगर बापू विदेशी सत्ता को लाठी से ना हांकते तो हम आज बस उन्हें कोस रहे होते। सच्चाई यह है की आज के नेताओं को हमने ही छूट दी। 
लेखक  निकला और फिरसे लिखने लगा ,अबकी बार उसका दिमाग स्वतंत्रता सेनानियों की ओर जाने लगा। एकाएक स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेता उसके दिमाग में जगह बनाने लगे और देखते ही देखते वह श्याही से बने शब्दों से   रेखाचित्र बन कागज़ से बाहर निकल पड़े। जिनमे गाँधी जी , शास्त्री जी ,सरदार सरदार पटेल ,डॉ आंबेडकर शामिल थे। मैनें सबको  प्रणाम किया और बैठने  अनुग्रह किया वो मान गए ,मैं झटपट कुछ नाश्ता ले आया उनके सत्कार के लिए। वह कुछ देर बैठे कुछ गुफ्तगू की सहसा गाँधी  बोले इस धरती का त्याग किये काफी समय बीत गया है, अब तो हमारी दिखाई राह पर ना जाने कितने लोग चल रहे होंगे। क्यों न चलकर थोड़ा भ्रमण कर आएं।
हम सब उठे और बाहर निकल लिए।
वह लोग आगे आगे में उनके पीछे हो लिया। हम मेरी कॉलोनी के बाहर ही निकले थे की तभी पटेल जी चौंक गए ,यह क्या सारी हरियाली कहाँ गायब  हो गयी। ऐसा  लग रहा है मानों सब जगह कंक्रीट के रेगिस्तान में आ गए हैं। सब लोग मृग की तरह बस इधर-उधर भाग रहे हैं। 
मैनें मन ही मन सोचा सही ही तो कह रहे हैं। है तो यह रेगिस्तान ही और मृग रुपी इंसान अपनी तृष्णा को बुझाने के लिए इधर उधर ही भटक रहा है। 
                                           काफी दूर तक सिर्फ गगन-चुम्बी इमारतें ही दिखी तो शास्त्री जी बोले खेत कहाँ हैं?
यहां तो खेत हुआ करते थे ,पर अब तो मकान ,ऑफिस ,या रोड ही दिख रहे हैं। जहाँ तक देखो बस अंतहीन रास्ते दिख रहे हैं। अगर इतनी तेजी से खेत ख़त्म  हो गए तो अर्थव्यवस्था ही चरमरा जाएगी ,हमारे रोज की आवश्यकता तो यहीं से पूरी होती है। थोड़ी दूर ही चले थे कि रस्ते में दंगा हो रहा था , बाबा साहब दंगा देख कर चौंक गए और ये सब है ,पुलिस कहाँ है ,जब क़ानून व्यवस्था सही से काम ही नहीं करेगी तो संविधान किस बात का?
मैनें कहा सर यह कोई आम या दुखी जनता नहीं जो पुलिस आकर स्तिथि सम्हाल लें और बाद में उसे सामान्य घटना बता सकें। यह तो रेजिस्टर्ड प्रॉप वाले दंगाई हैं जो जाती ,धर्म ,और अपनी धाक जमा रहे हैं। यह अटपटा जवाब सुन चाचा जी बोले यह क्या मतलब है , ऐसे सवालों को तो संसद में उठाना चाहिए जिससे सरकार का ध्यान इस और केंद्रित किया जा सके यह कह वो आगे  चल पड़े और में पीछे चल पड़ा। 
                                                                                                         आगे संसद भवन था हम सदन में घुसे अपनी अपनी जगह बैठे।  सबसे पहले बाबा साहब ने सदन को इंगित कर उन्होंने यह पूछा यह सब  है देश में ,हर मारा-मारी , गुंडागर्दी।,जिसको देखो एक दूसरे के पीछे पड़ा है,और आम लोग इन सब के बीच में पिसते हैं। 
तपाक से विपक्ष से जावाब आया यह तो जनता की ही कमी है जिसने गलत सरकार को चुना जिससे कुछ सम्हल ही नहीं रहा। हम होते तो कुछ नहीं होता। तभी पक्ष के नेता ने जवाब दिया प्रभु आप थे तो आपने ही क्या कर लिया। इससे पहले मामला बिगड़ता वह बैठ गए। 
अगला सवाल पूछा शास्त्री जी ने वह बोले ,जिस तरह से urbenisation बढ़ रहा है , और जमीनों की कीमत बेवजह बढ़ रही है उससे तो खेती जल्द ही ख़तम हो जाएगी और लोग ज्यादा पैसों के लालच में अपनी भूमि को विदेशी व्यापारियों के हाथों बेच रहे हैं। ऐसे तो "जय जवान जय किसान "का नारा व्यर्थ हो जाएगा। 
उनके उत्तर कुछ ऐसा था , शास्त्री जी "जय जवान जय किसान " तो पुराने वक़्त की बात थी ,अब तो जय विज्ञान का ही बोल-बाला है , खाद्द्यान की आपूर्ति तो हम विदेशो से भी करा लेंगे। पर जो आज अपने पास है उसे बेचकर पैसा कमाने में क्या बुराई है , आखिर इससे हमारे देश की इकॉनमी ही मजबूत होगी। और फिर जवान हो या किसान सबकी मौज होगी ,साथ में बिल्डर और बड़े-बड़े उद्द्योगपति की भी जय होगी। 
हमारी सरकार सबको समाहित करके चलती है। 
इतना  ही सरदार जी बोले ऐसे तो हमारी पूरी व्यवस्था ही चरमरा जाएगी। 
यह सुन चश्मा लगाए सफेदी में धुले बाबू खड़े होकर बोले , आंकड़े बताते हैं हमारा देश दिन प्रति दिन तरक्की कर रहा है ,हमारी अर्थव्यवस्था ६%को पार कर गयी है ,आज वायदा व्यापर से जनता तो जनता नेता , व्यापारी सब बिना ज्यादा म्हणत किये बस दिमाग से कमा रहे हैं ,और आप अर्थव्यवस्था की बात करते हैं। 
जब यह सब चल रहा था तो मैनें सोचा क्यों न में भी अपनी आम आदमी की उपस्तिथि दर्ज कराऊं क्यों न इन्हे बताऊ की जैसा यह सोचते हैं हक़ीक़त वैसी नहीं है। 
मैं खड़ा हुआ और बोला श्रीमान माना खेतो की जगह बड़े बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं , पर उसका क्या फायदा कोई नहीं खरीद सकता ,जितने मकान बिना बिके भी नहीं हैं उससे आधे लोग बेघर हैं ,और जो इन्वेस्टमेंट के नाम पर बिक गए उनका कुछ अत-पता नहीं है। 
आप व्यापार की बात करते हो क्या किया आपने , सारे बड़े बड़े व्यापारी लोन लेकर छोटे व्यापारियों को ख़त्म कर अपना वर्चस्व बाजार में कायम करना चाहते हैं क्या वह इतनी बड़ी संख्या में सबको काम दे सकते हैं ?
क्या वायदा व्यापर असली व्यापर है नहीं वह जो खुला जुआ है जो सरकार खिलवाती है। 
जिसमें कोई नहीं जीतता। और क्या बात करते हो आप विकास वृद्धि दर की , किसान विकास तो आज भी नहीं बढ़ा ना ही आपका "डाइरेक्ट टैक्स" बढ़ा क्यूंकि उससे सरकार की सही आमदनी खुल जाएगी और वो कोई भी नहीं बताना चाहता। दिन प्रति दिन महंगाई बढ़ रही है। 
बस फिर क्या था विपक्षियों को मौका मिल गया और वो जनता के हितैषी बन बैठे ,और जोर जोर से हंगामा करने लगे ,उन्होंने चीख चीख कर प्रश्नों की झड़ी लगा दी जिसका जवाब भी प्रश्नों में ही मिला। धीरे धरे झगड़ा और बढ़ गया मुंह की कहानी हाथों तक आने को तैयार थी ,कोई शांत होने को तैयार न था। इन सबके बीच मेरी नजर बापू पर पड़ी जो सुबक सुबक कर रो रहे थे और सब उन्हें सांत्वना दे रहे थे। 
में कुर्सी पर बैठा माथे पर हाथ रखा , मुझे एक पेन गिरने की आवाज आई और मेरी निद्रा टूटी मेरे सामने अब भी बापू थे जो तस्वीर में मुस्कुरा रहे थे ,लेकिन आँखें तो नाम ही थी ,
अंत में लिखना छोड़ मैनें बापू की तस्वीर की और देखा और कहा 
                                               "बापू तू क्यूँ रोता है"



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                                                            गगन टांकड़ा
                                                                (२००६)



































































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