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Monday, April 6, 2020

भुला देना

भुला देना  

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 गर इतना ही आसान होता भुला देना 
तो लैला, मजनू को 
हीर,रांझा को 
सोहनी ,महिवाल को 
 शिरीन , फरहाद को क्यों न भूली। 


गर इतना ही आसान होता दूर रहना 
तो नदी, समंदर से 
शम्मा ,पतंगे से 
धरती, आकाश से 
और प्रकृति प्रकाश से क्यूँ  दूर नहीं रहती। 


गर इतना ही आसान होती मोहोब्बत की  डगर 
तो आशिक 
ग़मों  डूबकर 
अश्को को पीकर 
अंगारों की राह पर क्यूँ चलता 



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गगन टांकड़ा 
(२४-०९-१६)

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