तुझे याद होगा
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उस रोज जब हम मिले थे
फिजाओं में एक अलग सा शबाब था
तू नहीं जानती
मैं तुझसे मिलने को उसदिन कितना बेताब था
आखिर वो लम्हा आया जब हम मिले थे
तेरी निगाहों में भी मुझसे मिलने की कसक देखि थी मैनें
हाथों में लेकर हाथ जब चूमें तेरे ज़रा सा
हिचकती देखी थी मैनें
पर वो मेरा नहीं उस मौसम का कसूर था
जो मुझे तुझे पाने के लिए करता आतुर था।
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गगन टांकड़ा
(२४-०९-१६)
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