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Tuesday, May 5, 2020

जो देखता हूँ झांककर खिड़कियों के परे


जो देखता हूँ झांककर खिड़कियों के परे 

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जो देखता हूँ झांककर
 खिड़कियों के परे
मुझे बस एक शहर दिखता है 
दिन में बुझता है 
और 
रातों में जलता है। 

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गगन टांकड़ा 
(२८-०४-२०१७)

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