"जिया हूँ जिंदगी बस तेरी (खुदा ) ही शर्तों पर
क्यूँ न आज एकख्वाहिश करूँ
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तुझे (खुदा )क्युं लगा आज खता हुई
क्या मेरी वफ़ाए (बंदगी)भी तुझे याद नहीं
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कबूल होगी तेरी (खुदा )हर सजा
बस एक बार जो वो (मोहोब्बत )मिलें
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चाहत बस इतनी हे
कि निगाहों को उनका दीदार मिले
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जो बस पानी पर भी उनका (मोहोब्बत )अक्स पड़े "
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-:गगन टांकड़ा :-
(२२/०७/१३)
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