*इज्जते शोहरते मिलती रही मुझे
में तो जग से आगे निकल आया
सब हे साथ मगर तन्हा हूँ
में तो अपना दिल ही पीछे छोड़ आया
*महफिलें सजी है आज
जमाने भर क लोग आये है
हुआ हे एहसास किसी की आहट का
वो आज मुझे फिर नजर आये है
*संभाल के रखा है मेरे दिल को
आजभी
ये जानता हूँ में
वो तो खफा बस मेरी बेवफाई से हैं
*आज तड़प रहा हूँ उसे पाने क लिए
जो हुई थी भूल उसे मिटाने क लिए
मगर अपना दर्द भला उन्हें सुनाऊँ भी तो कैसे
इन नजरो को सामने उनके उठाऊं भी तो कैसे
*मिलता है मौका जिंदगी में सबको एक बार
मुझे मिला है आज तो लूँ गलती सुधार
क्या हुआ जो सब बुरा मानेंगे
जमाने की रीत और इज्जत की बंदूकें तानेंगे
*है नहीं मुझे परवाह किसी की
ये क्या मेरा दर्द जानेंगे
*बंदिशें तोड़ कर इस जहां की
में पास उनके चला गया
शर्म से होंठ हिले ही नहीं
में सजदे में सर को झुका गया
*इश्क ही हे मेरा मज़हब
और खुदा खड़ा हे मेरे सामने
*मिली है मुझको माफ़ी
जो मुझसे भूल हुई
###और बरसों बाद मेरी दुआ कुबूल हुई. ###
"गगन टांकड़ा "
{०२/०६/२०१३ }
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