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Thursday, September 26, 2019

मेरी दुआ कुबूल हुई. ..


*इज्जते शोहरते मिलती रही मुझे 
में तो जग से आगे निकल आया 

सब हे साथ मगर तन्हा हूँ 

में तो अपना दिल ही पीछे छोड़ आया 


*महफिलें सजी है  आज 

जमाने भर क लोग आये है 

हुआ हे एहसास किसी की आहट का 

वो आज मुझे फिर नजर आये है 


*संभाल के रखा है मेरे दिल को 

             आजभी 
      ये जानता हूँ में 

वो तो खफा बस मेरी बेवफाई से हैं 


*आज तड़प रहा हूँ उसे पाने क लिए 

जो हुई थी भूल उसे मिटाने क लिए 

मगर अपना दर्द भला उन्हें सुनाऊँ भी तो कैसे 

इन नजरो को सामने उनके उठाऊं भी तो कैसे 


*मिलता है मौका जिंदगी में सबको एक बार 

मुझे मिला है आज  तो लूँ गलती सुधार 

क्या हुआ जो सब बुरा मानेंगे 

जमाने की रीत और इज्जत की बंदूकें  तानेंगे 


*है नहीं मुझे परवाह किसी की 

ये क्या मेरा दर्द जानेंगे 


*बंदिशें तोड़ कर इस जहां की

 में पास उनके चला गया 

शर्म से होंठ हिले ही नहीं 

में सजदे में सर को झुका गया 


*इश्क ही हे मेरा मज़हब

और खुदा  खड़ा हे मेरे सामने 


*मिली है मुझको माफ़ी 
जो मुझसे भूल हुई 

###और बरसों बाद मेरी दुआ कुबूल हुई. ###





"गगन टांकड़ा " 
{०२/०६/२०१३ }











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