"तेरे इन्तजार में शमा बुझ रही है
रफ्ता --रफ्ता
तुझे पास न पाकर दिल जल रहा है
रफ्ता रफ्ता
मंजिल-ऐ -जहां पाने का क्या फायदा
जो तू न चले मेरे संग
हर गली हर मोड़ हर रस्ता "
रफ्ता..... रफ्ता..... रफ्ता ......
"गगन टांकड़ा "
(३१/०१/१४)
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