अमर बेल सी यादें तेरी
जितना आगे बढ़ता हूँ
उतना जकड़ती हैं।
रेत की तरह यादें तेरी
जितना मुट्ठी में कैद करता हूँ
उतना ही फिसलती है।
आतिश-ऐ-आफताब सी यादें तेरी
जितना छुपाता हूँ
उतनी ही रोशन जहाँ करती है।
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%%गगन टांकड़ा %%
(०३/०६/१५)
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