पतंग
======
सुबह सुबह बैठा था आराम कुर्सी पर धूप के सामने अखबार की ख़बरों की उधेड़-बुन में। कार्टून पढ़कर हँस पड़ता और राजनितिक टिप्पड़ियों पर अपनी राय दे रहा था।
अचानक सर्रर्रर्र -सर्रर्रर्र की आवाज ने मेरा ध्यान बांटा। देखा तो एक पतंग आसमान को छूने की कोशिश कर रही थी।
उसे देख मेरे मन में अचानक एक ख्वाब आया , क्या इस पतंग को यह बात पता है कि वह आसमान कितना दूर है। यह पतंग चाहे भी तो उसे नहीं छू सकती। उस पतंग ने मेरे आगे नाच-नाच कर फिर मेरा ध्यान खींचा और मुझे लगा जैसे वो मुझे बताना चाह रही हो कि वह जानती है आसमान बहुत दूर है। फिरभी वह दोनों पंख फैलाए ऊँचे से ऊंचा उड़ने की कोशिश कर रही थी,क्योंकि उसे कामियाबी ना मिलने का डर नहीं ,बल्कि उसे डर इस बात का है कि जिस विश्वास से उसे उड़ाया गया है वह विश्वास कहीं बीच में ही न टूट जाए।
यह सुन मेरा मन और भी उस पतंग के संग हो लिया ,ताकि वह कुछ और वक्त उस पतंग के साथ बिता सके और उस(पतंग) मुस्तफा से कुछ सिख सके।
फिर क्या था ख़यालों की दुनिया में मेरे भी पंख लग गए और मैं भी उस पतंग के साथ हो लिया उस मस्तानी के साथ लग रहा था जैसे जीवन का असली मतलब समझ रहा हूँ। एक छोटी सी पतंग जो सिर्फ पतले से कागज की बनी है और मजबूती के नाम पर बस दो सींके ,उसके बावजूद उन कुछ पलों में वो मुझे जीवन जीने का तरीका बता गयी।
उसने बताया की जीवन एक पतंग ही तो है ,उसे मालिक ने खुले आसमान में उड़ने के लिए ही तो बनाया है। और वही पतंग फलक तक ऊँची उड़ती है जिसको उसके मालिक ने अच्छे से ,प्यार से तैयार किया है। जिसके कन्नो को गुणों के धागे से बाँधा हो और आत्मविश्वास के मंजे लगाए हों।
और जिसको ईर्ष्या के भाव के साथ बनाया हो ,जिसके जोते अवगुणो से बने हों जिसमें अज्ञानता,अविश्वास का मांजा लगा हो,उस पतंग का वज़ूद ज्यादा देर नहीं टिक पाता। उसे या तो कोई दूसरी पतंग काट डालती है , या वही रास्ते में किसी पेड़ या दीवार से टकराकर भटक जाती है।
बस इतना कह उसने मुझे अलविदा कहा और फिर सर्रर्रर्र -सर्रर्रर्रर्र कर मेरी आँखों के आगे से ओझल हो गयी।
देखते ही देखते काफी ऊंचाई तक जा पहुंची बिलकुल सूरज की सीध में ,ऊपर नजर करके देखा तो लगा जैसे उसके चमकीले शरीर के पीछे से आने वाली सूरज की किरणों ने उसे स्वर्णिम बना दिया हो। उसकी चमक इतनी बढ़ गयी की उसे देखना भी बस का ना रहा।
उस मनोहर दृश्य को देखकर ऐसा ख़याल उठा कि इस पतंग को ही जैसे जीवन का सच पता हो। यदि इस पतंग के गुण हम सभी में आ जाए तो हम भी इसी की तरह खुले आकाश में सुनहरे पंखो को फैलाये उड़ सकेंगे।
===============================================
गगन टांकड़ा
(२००६)
No comments:
Post a Comment