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दोस्तों आज मुझे बहूत पुरानी बात याद आगयी जब। मैं कक्षा आठ में था। मैं कोई बहुत होशियार बच्चा तो था नहीं ऊपर से पढ़ाई का भूत मुझे रोज सताता था , खासकर गणित वो तो जैसे मेरे जीवन में राक्छस की तरह था , जब तक एक पाठ समझ आता दुसरा और विकराल रूप ले आता , ऊपर से शिक्षक की सख्ती का भय या यूँ समझे मेरा शिक्षक सम्मुख जाने का भय हरदम डराता था।
एक बार मैं इतना भयभीत हो गया की विद्यालय ना जाने की सोचता रहता ,मगर वो संभव नहीं था। मैने कुछ ऐसे मित्रों से बात की जो चतुर प्रवत्ति के थे, उन्होंने मुझे सुझाया की जब तुम्हे लगे क्लास से पहले तबियत ख़राब होने का बहाना बनाया करो और रेस्ट रूम में आराम करने चले जाया करो।
मैनें बिना विचार के ही उनकी बात मान ली और चुप चाप जाकर रेस्ट रूम में लेट गया। कुछ दिन तक यही चला और मैनें इसको ही गणित से बचने का एकमात्र साधन मान लिया।
और जब भी कोई मुसीबत आती पहले से ही रेस्ट रूम में जाने के लिए तैयार रहता।
बिना ये सोचे की इसका परिणाम क्या होगा , मैं अपने चतुर मित्रों के साथ ज्यादा समय भी देने लगा। जबकि मेरी दोस्ती हमेशा सबसे ही रही हैं , इसकी एक वजह मेरा शांत स्वभाव भी रहा। कक्षा के अच्छे बच्चों ने मुझे कई बार समझाया मगर मैं नहीं माना। क्युकी मुझे परेशानी से भागने का अच्छा रास्ता मिल गया था।
पर मुझे पता नहीं था की मेरी नीति उलट भी हो सकती है।
एक दिन प्रधानाचार्य जी ने मुझे बुलाया ,में समझा नहीं क्या हुआ , में डरते हुए उनके ऑफिस में गया वह बड़े ही कड़क स्वभाव वाले व्यक्ति थे। मुझे उन्होंने मुझे बुलाया अपने बगल में बिठाया , मेने देखा वहाँ मेरे हिंदी के शिक्षक खड़े थे जो मेरे बारे में प्रधानाचार्य जी को बता रहे थे। वह मेरे स्वभाव से अच्छी तरह परिचित थे और मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी।
मुझे अंदर ही अंदर डर भी था और झुंझलाहट भी। डर प्रधानाचार्य जी के डेढ़ मीटर लम्बे डंडे का , और झुंझलाहट अध्यापक की चुगली का उनके विषय में तो हमेशा में अच्छा रहा था।
मेरा रिपोर्ट कार्ड सामने था प्रधानचार्य जी ने मुझसे मेरे कृत्य के बारे में पूछा मेने उन्हें बिना किसी लपेट के बता दिया , उन्होंने मुझसे यह भी पुछा कि यह मेरे मन में कहाँ से आया मैनें सारा वृत्तांत बता दिया और दोस्तों की दी हुई सिख भी। वह सुनते रहे उन्होंने बस इतना कहा क्या जो तुम ये कर रहे हो यह अपने संग धोखा करना नहीं है। तुम्हारे पहले ही अंक काम हैं , अब नहीं पढोगे तो क्या लाओगे , में ऊपर से नीचे तक शर्मसार था ,बोल भी नहीं पा रहा था , वह समझ गए और मुझे अध्यापक के साथ जाने को कहा।
मैं बाहर निकला और आचार्य जी के साथ स्टाफ रूम में चला गया, वहाँ कई शिक्षक बैठे थे लगभग मुझे सब जानते थे , मुझे देखकरबाट करने लगे , मैं शर्म से पानी पानी था और सुबक भी रहा था तभी पीछे से गणित के अध्यापक आए और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले।
आओ मेरे साथ बैठो मैं यही सोच रहा था की ये मुझे ताना मारेंगे हिंदी वालों ने कहा भाई ये बच्चा तो बड़ा सीधा है आप क्यों डराते हो इसे , यह सुन गणित अध्यापक हँसे और बोले मुझे भी पता है यह तो लेकिन मैं खुद इसके इस कृत्य से अचंभित हो गया , उन्होंने अपने साथ मुझे बिठाया और एक कॉपी दिखाई जिसमे मैनें क्या क्या छोड़ दिया है सब लिखा था. मैं इतना काम छोड़ दिया था जिसे मैं चाहकर भी पूरा नहीं करसकता था।
उन्होंने मुझसे समस्या जानीं मैने उन्हें भी सारा वृतांत बता दिया की मुझे कैसे गणित समझने में परेशानी होती है।
उन्होंने कहा अगर समझ नहीं आता तो पूछो,मैंने डांट का डर बताया तो वह बोले अगर डरते ही रहोगे तो नया सीखोगे ही कैसे आओ तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ।
यह कहानी मेरे जीवन की एक बड़ी सीख में से एक है।
एक बार एक अस्तबल में बहुत अच्छे अच्छे घोड़े थे राजा के मुख्य घोड़े उसी अस्तबल में बांधते थे। एक बार राजा वहाँ आए और अस्तबल का निरिक्षण करने लगे , उन्होने देखा सभी घोड़े शांति पूर्वक हैं लेकिन एक घोड़ा बाहर रस्सी से बंधा हुआ है वह अशांत है इधर उधर भाग रहा है , कोशिश करने पर भी वह काबू में नहीं आ रहा। वह कभी दाएं भागता कभी बाएं, किसी भी तरह अपने आप को खूंटे से उखाड़ कर दूर ले जाना चाहता।
राजा ने पूछा यह घोड़ा ऐसे क्यों कर रहा है। सेवक ने कहा राजन यह नया है , अभी खूंटे से बंधना नहीं सीखा है कुछ दिन बीत जाएंगे यह काबू में आ जाएगा। राजा चले गए।
एक दिन राजा के समक्ष एक सन्यासी आए उन्होंने राजा से एक घोड़ा दान में माँगा ताकि वह दूर दराज धर्म जागरण के लिए जा सके।
राजा उन्हें अपने साथ अस्तबल में ले गए वहाँ जाकर देखा तो वह घोड़ा आज भी वही बंधा था और वैसे ही कृत्य कर रहा था , राजा ने सेवक से पूछा तो वह बोला श्री मान इसे खूब काबू में करने कोशिश की लेकिन यह शांत ही नहीं होता शायद यह जंगली ही रहेगा। संत ने घोड़े को देखा और बोला राजन आपकी इच्छा हो तो क्या मैं इसी घोड़े को ले सकता हूँ राजा चौंक गया वह बोला , हे सन्यासी आपके लिए तो मै ऐसा घोड़ा दूंगा जो मीलों चल सके और आपके हर इशारे को समझ सके। ऐसा घोड़ा देकर क्या फायदा जो आपसे सम्हले ही ना और कहीं चोटिल और न कर दे। संत बोले राजन आप घबराइए ना मैनें देख लिया है इसके टक्कर का आपके अस्तबल में एक भी अश्व नहीं है। इसलिए मुझे यही अश्व देने की कृपा करें। राजा के मनाने के बाद भी वह नहीं माने और सेवक से बोले तुम जाकर इसपर जीन चढ़ाओ यदि मैं इसपर काबू नहीं कर पाया तो एक भी अश्व नहीं लूंगा , पैदल ही यात्रा करूँगा।
यह सुन सेवक ने जीन चढ़ा दी। संत घोड़े के पास आए उन्होंने उसे सहलाना चाहा वह बिदक गया। फिर उन्होंने उसकी पीठ पर चढ़ने की कोशिश की एक दो असफल कोशिश के बाद वह कामयाब रहे और तुरंत आजाद कराने के लिए बोले , सेवक ने इशारा पाते ही रस्सी खोल दी। घोड़ा एक साथ बाड़ा फलांग कर भागा और दूर निकल गया राजा भयभीत था कहीं संत को कोई परेशानी ना हो।
थोड़ी देर बाद देखा संत उस घोड़े को हांकते हुए ला रहे थे ,और वह घोड़ा उनके हर इशारे को समझ रहा था।
संत उतरे और इस चमत्कार का रहस्य जाना। वह बोला हे सन्यासी मुझे बताए आप ने इसे काबू में कैसे किया।
संत मुस्कुराए और बोले राजन मैनें इसे काबू में नहीं किया बल्कि इसने अपने आप को काबू में किया है।
यह घोडा खुले में विचरण करता था इसे बाड़े में बांधने की आदत ही नहीं थी ऊपर से यह अपनी ही छाया से डर गया , इसको शायद लगा होगा वह इसे नुक्सान पहुंचाएगी इसलिए वह भागना चाहता था जो रस्सी इसे करने ही नहीं देती थी ,अपने बंधन को यह घातक समझ रहा था ,जब आजाद हुआ तो अपने विवेक को जगा पाया और भागते समय अपने साथ भागति अपनी परछाई को दुशमन की जगह साथी समझने लगा। बस जब इसने अपने को काबू में कर लिया तो यह मेरे इशारे भी समझने लगा मुझे इसे काबू करने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
राजा और सेवक ने संत के चरण छुए और धर्म दर्शन कराने को कहा।
संत बोले राजन इस घटना में ही शिक्षा छुपी है।
राजन जैसे यह अश्व परछाई को अपना दुश्मन समझ भागने की कोशिश कर रहा था , उसी तरह हम भी दुःख ,तकलीफ,कठिनाइयों को दुश्मन समझ उनसे भागने की कोशिश करते रहते हैं हमें समझना पड़ता है जिससे हम भाग रहे वह हमारी परछाई ही है , जैसे सुकून की शाम आती है , उसी तरह कठिनाइयों के दिन भी आते हैं।
अब यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है हम उसका कैसे सामना करते हैं ,या उस समस्य का हल बिना अपना सयंम गवाए बिना निकाल सकते हैं।
तो हे राजन कभी भी कोई परिस्तिथि हो वहां से भागना मत उसका हल वहीँ से निकलना। अब मैं चलता हूँ।
कहानी खत्म हो गयी और मेरी भी समझ में आगयी की कितनी बड़ी बेवकूफी मैनें की है,
दोस्तों आचार्य जी ने कहा कोई बात नहीं अगर गणित समझ नहीं आता फेल ही तो होंगे लेकिन इस तरह तो तुम अपनी और अपने घर वालो की छवी को सबके सामने बिगाड़ दोगे।
मुझे समझ आ चुकी थी कमाल ये है कि मुझे कभी माफ़ी मांगने के लिए नहीं किया गया क्यूंकि एक बार मुंह से माफ़ी मांग लेने पर अगली बार दूसरी गलती करने का दरवाजा खुल जाता है। उन्होंने कहा की इस बार हुई गलती से सीख लो और समझ जाओ आगे से दुबारा यह नहीं होगा।
उन्होंने मेरे मन में पनपे अपराध बोध को नष्ट करदिया।
सच में गुरु जन बुराई को किस तरह अच्छाई की तरफ ले जाते हैं वह वंदनीय है।
मैं आगे भी कुछ ज्यादा अच्छा गणित नहीं समझ पाया लेकिन उनकी शिक्षा से कभी भागा नहीं।
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गगन टांकड़ा
(२९-०४२०२० )
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