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Thursday, May 7, 2020

किसी भी बात पर ठहाके लगाना छोड़ दिया




किसी भी बात पर ठहाके लगाना छोड़ दिया। 

वो छत पर जाकर बारिशों में नहाना छोड़ दिया। 

छोड़ दिया भरी धूप में पेड़ों के निचे मिटटी से खेलना। 

छोड़ दिया अब यारों को पीछे से आकर धकेलना। 

मगर नहीं छूटी वो याद  बचपन की। 

घरवालों से छुप कर जागी वो रात बचपन की। 

⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈⥈

गगन टांकड़ा 
(२८-०४-१७) 

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